36 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
| ^U; | k; |
|---|
‘‘न्याय की जीत’’
जब पिछली मार्च में, डॉ. अम्बेडकर ने महाद में चौदार तालाब तक अछूतों का नेतृत्व किया तो हिन्दू जाति के रूढि़वादी वर्ग की भूख और ‘‘अपवित्रीकरण’ पर नींद उड़ गई तथा गरीब असहाय अछूतों की तालाब से लौटते समय निर्दयता से पिटाई की गई। इसके शीघ्र बाद हुड़दंगियों और उपद्रवियों के विरुद्ध आपराधिक मुकदमा दायर किया गया तथा उन्हें सार्वजनिक शांति भंग करने के लिए दंड दिया गया। धर्म के इन तथाकथित ‘‘संरक्षकों’’ द्वारा अछूतों को तालाब के समीप आने का विरोध करने का हर संभव प्रयास किया गया और रूढि़वादी प्रेस द्वारा उनकी कार्रवाई को प्रोत्साहित किया गया। यह उनके सामान्य मानवाधिकारों की रक्षा के लिए था, जिसके लिए अछूतों ने सत्याग्रह आंदोलन किया था और पिछले दिसम्बर में लगभग 10,000 लोग एकत्रित हुए, इनका एक सम्मेलन हुआ तथा सर्वसम्मति से तालाब तक यात्रा करने का संकल्प लिया गया। परंतु हिन्दू जाति के रूढि़वादियों, ने जिन्हें इस संकल्प का पता चल गया था, तालाब का उपयोग कर रहे अछूतों के विरुद्ध इस आधार पर कि यह किसी श्री चौधरी और स्पृश्य वर्ग की निजी संपत्ति है, महाड के उप-न्यायाधीश ने अस्थायी निषेधाज्ञा प्राप्त कर ली। प्राधिकारियों से यह राहत प्राप्त करने के बाद स्पृश्यों ने सोचा कि उन्होंनें सरकार और अछूतों पर वर्चस्व प्राप्त कर लिया है। डॉ. अम्बेडकर ने तत्काल इस चाल को जान लिया। परंतु सिविल मुकदमे के निपटाए जाने तक सत्याग्रह स्थगित करने का निर्णय लिया। यह मुकदमा महाड के उप-न्यायाधीश श्री वैद्य के समक्ष दिनांक 23 फरवरी, 1928 को सुनवाई के लिए आया और डॉ. अम्बेडकर ने अपनी विलक्षण बहस से न केवल निषेधाज्ञा रद्द कराई बल्कि न्यायाधीश को सार्वजनिक तालाब के प्रयोग के उनके अधिकार की सहभाविकता से भी आश्वस्त किया। चूंकि पाबंदी हटा दी गई है इसलिए अब तालाब को बंबई विधान परिषद के संकल्प के अनुसार सार्वजनिक प्रयोग के लिए खोला जाना है।
| l | R;k |
|---|
| izk | jaHk |
|---|
अब, रविवार दिनांक 26 फरवरी को बंबई में हुई लगभग 2000 लोगों की सार्वजनिक सभा में महाद में सत्याग्रह पुनः प्रारंभ करने का संकल्प लिया गया। सत्याग्रह समिति की शीघ्र बैठक हो रही है और वास्तविक तारीख की शीघ्र ही घोषणा की जाएगी।
डॉ. अम्बेडकर के नेतृत्व में देश के इस भाग में अछूत आंदोलन का अनुसरण और अध्ययन करने वाले बहुत सुरक्षित तथा निर्भीकतापूर्वक कह सकते हैं कि आंदोलन की