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एक सम्मेलन में मिले थे, तालाब के पास पहुंचने का प्रयास किया और। ‘‘उच्चतर’’ हिंदू वर्ग के लोगों द्वारा उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया तथा मारपीट की गई तथा कुछ चमारों को गंभीर चोटें पहुंची। इन उच्च वर्ग के हिन्दुओं के नेताओं ने तब इस आधार पर कि ‘‘अछूतों’’ द्वारा उन पर मौजूदा प्रथागत पाबंदी के उल्लंघन में तालाब से पानी लेने का प्रयास सार्वजनिक शांति को खतरा उत्पन्न करेगा, जिलाधीश से दंड संहिता की धारा 144 के अधीन निषेधाज्ञा की मांग की।
जिलाधीश ने कोई भी कार्रवाई करने से मना कर दिया। उन्होंने तब उप-न्यायाधीश को आवेदन दिया और वे ‘‘अछूतों’’ के नेताओं के विरुद्ध उनसे अस्थायी निषेधाज्ञा प्राप्त करने में सफल रहे और इसके फलस्वरूप अपेक्षित सत्याग्रह तथा तालाब से पानी लेने की दृष्टि से वहां तक ‘‘उच्च’’ जाति की अवज्ञा में यात्रा करने का विचार त्याग देना पड़ा। तथापि, अब उप-न्यायाधीश ने इस साक्ष्य से कि ‘‘ऐसे अधिकार के प्रयोग में कोई भी हस्तक्षेप गैर-कानूनी होगा’’, अपने समाधान की घोषणा करते हुए निषेधाज्ञा रद्द कर दी है। तथाकथित उच्च जाति के लोगों को जनता के किसी सदस्य को तालाब, से जो निजी संपत्ति नहीं है और जैसा कि वे स्वयं पूर्णतः जानते हैं कि वह नगरपालिका का तालाब है और जिसे कोई भी व्यक्ति, जो जाति के पूर्वाग्रह से ग्रस्त नहीं है, स्वीकार करेगा, पानी लेने से रोकने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। अगर स्थानीय नगरपालिका प्राधिकारियों को मामले में कोई संदेह था तो उसे यह घोषणा करते हुए कि नगरपालिका के सभी तालाब, कुंए और धर्मशालाएं बिना किसी भी भेदभाव के जनता के सभी वर्गों के लिए खुले होने चाहिएं, बंबई विधान परिषद द्वारा सितम्बर, 1926 में पारित संकल्प द्वारा दूर कर दिया गया है। यह अकल्पनीय है कि समुदाय के किसी वर्ग को उनकी अपनी जाति की वैयक्तिक ‘‘श्रेष्ठता’’ की धारणा के कारण किसी अन्य वर्ग को सार्वजनिक निधि से प्रदान की गई सुविधाओं का उपभोग करने से रोकने का अधिकार हो। ऐसी धारणा का न केवल दलित और वंचित वर्गों के हित में बल्कि इससे भी अधिक स्वयं तथाकथित श्रेष्ठ वर्गों के हित में भी तिरस्कार किया जाना चाहिए। पूर्णतः अनुचित होने के साथ-साथ अपने साथियों और मानव जाति के साथ ऐसे व्यवहार से उच्च जातियों के लिए बहुत अवांछनीय परिणाम होंगे क्योंकि कभी न कभी दलित अनुचित रूप से नकारे गए अपने मानवीय, नागरिक और राजनीतिक अधिकारों के साथ आगे आएंगे और उनकी उत्कट भावना उनके पूर्व दमनककारियों पर भारी पड़ सकती है।
राष्ट्रीय आंदोलन के प्रति दलित वर्गों की सहानुभ्ूति के हस्तांतरण को वर्तमान दुखद दशाओं के स्थायीकरण के विरुद्ध पर्याप्त चेतावनी भी मानना होगा। आइए आशा करें कि जब कुछ दिनों में डॉ. अम्बेडकर और उनकी जाति के उनके अनुयायी महाद की ओर वहां सार्वजनिक तालाब से पानी लेने के अपने अधिकार पर दृढ़ रहने