45
जनवरी, 1933 को प्रतिवादियों डॉ. बी. आर. अम्बेडकर और अन्य के पक्ष में मुकदमे का निर्णय दिया।
इसके बाद सवर्ण हिन्दू अपीलकर्ताओं ने बंबई उच्च न्यायालय, में पुनः अपील फाइल की। यह मामला चार वर्षों तक चला। अंत में न्यायमूर्ति ब्रूमफील्ड और न्यायमूर्ति वाडिया ने सर्वण हिन्दूओं की अपील दिनांक 17 मार्च, 1937 को नामंजूर कर दी क्योंकि वे चौदार तालाब की भूमि पर अपना स्वामित्व सिद्ध नहीं कर सके।
बंबई उच्च न्यायालय का निर्णय निम्नानुसार है :
‘‘अपीली डिक्री के विरुद्ध से वर्ष 1933 की अपील संख्या 462
नरहरि दामोदर वैद्य और अन्य
(मूल वादी संख्या 2 से 6) ..............................अपीलकर्ता
बनाम
डॉ. भीमराव रामजी अम्बेडकर, सदस्य, संयुक्त संसदीय समिति, लंदन और अन्य
(मूल प्रतिवादी) .................................प्रत्यर्थी
वर्ष 1931 की अपील संख्या 32 में थाना में एस. एम. कैकिनी, एस्क्वायर, द्वितीय सहायक न्यायाधीश के निर्णय के विरुद्ध दूसरी अपील
अपीलकर्ता की ओर से........................ श्री वी.बी. वीरकर
प्रतिवादी संख्या 1 की ओर से............................ श्री बी. जी. मोदक के साथ अधिवक्ता श्री एस. वी. गुप्ते
ता. 17 मार्च, 1937
गणपूर्ति :- न्याय. एन.जे. ब्रूमफील्ड और न्याय. जे.जे. वाडिया
न्याय. श्री एन. जे. ब्रूमफील्ड द्वारा मौखिक निर्णय सुनाया गया :-
महाद नगर के सवर्ण हिन्दुओं की ओर से अपीलकर्ताओं ने उन प्रत्यार्थियों के विरुद्ध मुकदमा चलाया था, जिन्होंने इस घोषणा के लिए कि शहर के समीप चौदार तालाब उनका है और यह कि केवल उन्हें ही उसके प्रयोग का अधिकार है तथा प्रत्यर्थी उसका उपयोग करने के हकदार नहीं है और उसका उपयोग न करने के लिए प्रत्यार्थियों के विरुद्ध निषेधाज्ञा के लिए तथाकथित ‘‘अछूतों का प्रतिनिधित्व किया। अब स्वामित्व के दावे का आग्रह नहीं किया गया है और जैसा विचारण न्यायालय का निष्कर्ष है, यह माना जाता है कि तालाब का स्वामित्व भू-राजस्व संहिता की धारा 37 के प्रावधानों के अधीन सरकार के पास है और अब यह जिला नगरपालिका अधिनियम की धारा 50 के अधीन महाद नगरपालिका में निहित है। अब यह भी माना जाता है कि हिन्दू दुनिया में सब की तुलना में तालाब के विशिष्ट प्रयोक्ता के