खण्ड - I महाड सत्याग्रह पानी के लिए नहीं, बलिकु मानवाधिकारों की स्थापना के लिए - Page 65

48 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

विस्तार के बाद तक कब्जाए जाने की संभावना नहीं होगी), तब तक सुरक्षित रूप से पूर्वानुमान किया जा सकता है कि वर्तमान के समान ही प्रथा थी। तथापि, यह पूर्वानुमान करना सुरक्षित नहीं होगा कि कथित प्रथा को स्थापित करने के लिए पर्याप्त अवधि के दौरान स्थितियाँ समान रही हैं। कोंकण का अपेक्षाकृत आधुनिक काल में भी उतार-चढ़ाव का इतिहास रहा है और यह मानना कि सवर्ण हिन्दू स्मरणातीत काल से इस रूप में स्थित इस बड़े प्राकृतिक जलाशय पर अनन्य नियंत्रण रखने की स्थिति में रहे हैं, युक्तियुक्त संभाव्यता के विपरीत होगा।

इस संबंध में, मरियप्पा बनाम वैथीलिंगा में सर सदाशिव अयय्यर की मताभिव्यक्ति बहुत शिक्षाप्रद है। वे मनु की उक्ति को उदधृत करते हैं; ‘‘जल तब तक शुद्ध रहता है जब तक गाय अपनी प्यास बुझाने के लिए जाती है और उसमें अच्छी सुगंध, रंग तथा स्वाद होता है’’, और वे इंगित करते हैं कि शास्त्रीय लेखों में नदियों, तालाबों और अन्य जल स्रोतों, जो अधिक सरलतापूर्वक संदूषित हो जाते हैं और जहां समय, वायुमंडलीय दशाओं और जल के आवागमन द्वारा शुद्धिकरण बहुत अधिक कठिन होता है, के बीच भेद किया गया है।’’ विद्वान न्यायाधीश सुझाव देते हैं कि हिन्दू धर्म के अधिदेश को एक बड़े खुले तालाब में पानी प्रदूषण के प्रति किसी विस्तृत सावधानी की अपेक्षा नहीं होगी, और वह महाद में चौदार तालाब से काफी छोटे एक गांव के तालाब पर कार्रवाई कर रहा है। इसलिए, ‘‘अस्पृश्यता’’ के सिद्धांत द्वारा अपीलकर्ताओं के मुकदमे को बहुत अधिक समर्थन प्रदान करना प्रतीत नहीं होता और यह संदेहास्पद है कि क्या तब तक जल के अनन्य प्रयोक्ता को सुनिश्चित करने का कोई प्रयास किया जाएगा जब तक तालाब के चारों ओर सवर्ण हिन्दुओं के घर नहीं बस जाते।

यह एकमात्र मुकदमा है, जिसपर हमारा ध्यान आकृष्ट किया गया है। यह वर्णन जल-स्रोत के स्थल के प्रयोग से अछूतों को अपवर्जित करने के दावे के बारे में है। मंदिर प्रवेश का मुकदमा अर्थात् आनंदराव एन. शंकर (1883), आईएलआर 7 बंबई, 323 और शंकरलिंगा बनाम राजेश्वर, (1908) आईएलआर, 31 मद्रास 236 पीसी, वास्तव में सुस्पश्ट नहीं हैं। ऐसे मुकदमे में, अन्य जातियों और समुदायों द्वारा दीर्घकालीन चलन की मौन स्वीकृति, स्वाभाविक रूप से उच्च जाति के अनन्य प्रयोग के लिए समर्पण की उपधारणा को जन्म दे सकती है और ‘‘अछूतों’’ पर यह सिद्ध करने का बोझ डाल सकती है कि वे ऐसे लोगों में से हैं, जिनकी पूजा के लिए एक विशिष्ट मंदिर मौजूद है। यह नहीं कहा जा सकता कि यहां रूढि़ के किसी विधिपूर्ण उत्पत्ति की ऐसी कोई उपधारणा उत्पन्न होती है।

इसलिए हम विद्वान सहायक न्यायाधीश से सहमत हैं कि अपीलकर्ताओं ने स्मरण् ातीत रूढ़ी; जिसे वे अभिकथित करते हैं, सिद्ध नहीं की है। अगर इस बिन्दु पर