1. मेरी कोई मातृभूमि नहीं है - Page 71

54 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

प्रति विश्वासघात के शिकार होते हैं, तो उसका उत्तरदायित्व एकमात्र उस पर ही होगा। मुझे देशद्रोही कहलाए जाने का कोई दुख नहीं है, क्योंकि हमारे कार्य का उत्तरदायित्व उस भूमि पर है जो मुझे देशद्रोही कहती है। आप जैसा कहते हैं इस देश के देशभक्तिपूर्ण कार्यों के लिए सहायक अथवा लाभप्रद अगर मैंने कोई राष्ट्रीय सेवा की है तो यह मेरे बेदाग अंतःकरण के कारण है न कि मुझमें किसी देश प्रेम की भावनाओं के कारण। अगर अपने लोगों, जिन्हें सदियों से इस देश में कुचला गया है, के लिए मानवाधिकारों की प्राप्ति के अपने प्रयास में मैं इस देश का कोई अपकार करता हूं तो यह कोई पाप नहीं होगा; और मेरे कार्य से इस देश को कोई नुकसान नहीं पहुंचता है तो यह मेरे विवेक के कारण हो सकता है। मेरी अंतःकरण की प्रेरणा के कारण, मैं इस देश को कोई नुकसान पहुंचाए बिना ही अपने लोगों के लिए मानवाधिकारों की प्राप्ति के लिए प्रयास कर रहा हूँ।

वातावरण गंभीर हो गया। चेहरों के रंग बदल गए। गांधी बैचेन हो रहे थे। वह डॉ. अम्बेडकर की बात को मोड़ना चाहते थे। तभी डॉ. अम्बेडकर ने उनसे सर्वाधिक अनिवार्य प्रश्न पूछा जो साक्षात्कार का उद्देश्य था।

अम्बेडकर : हर कोई जानता है कि मुसलमान और सिख अछूतों की अपेक्षा सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक रूप से अधिक उन्नत हैं। गोल मेज सम्मेलन के प्रथम सत्र ने मुसलमानों की मांगों को राजनीतिक मान्यता दी है और उसने उनके लिए राजनीतिक रक्षोपायों की सिफारिश की है। कांग्रेस ने उनकी मांगों पर सहमति दी है। प्रथम सत्र ने दलित वर्गों के राजनीतिक रक्षापायों और पर्याप्त प्रतिनिधित्व की सिफारिश की है। हमारे अनुसार वह दलित वर्गों के लिए लाभदायी है। आपकी क्या राय है?

गाँधी : मैं हिन्दुओं से अछूतों के राजनीतिक पृथक्करण के विरुद्ध हूँ। वह पूर्णतः घातक होगा।

अम्बेडकर (उठते हुए) : मैं स्पष्ट राय के लिए आपको धन्यवाद देता हूँ। यह अच्छी बात है कि मैं अब जानता हूँ कि हम इस महत्वपूर्ण समस्या के संबंध में किस स्थिति में हैं। मैं आपसे विदा लेता हूँ। *

डॉ. अम्बेडकर अपनी पूरी शक्ति से इस मुद्दे से लड़ने और अपने दलित लोगों के लिए मानवाधिकार प्राप्त करने के प्रचंड संकल्प से दमकते चेहरे से हॉल छोड़कर चले गए।

* द नवयुग - अम्बेडकर विषेषांक, 13 अप्रैल, 1947 ।