1. मेरी कोई मातृभूमि नहीं है - Page 72

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इस प्रकार साक्षात्कार उग्र वातावरण में समाप्त हुआ। गाँधी भारतीय राजनीति के स्वामी तानाशाह और भारतीय जनसाधारण, के वेताज बादशाह जो उनके गतिशील कार्य से आश्चर्यचकित थे। गाँधी जी को वापस जवाब देना स्थायी अप्रसन्नता तथा कटुता उत्पन्न करना था और वह भी हिन्दू नेता द्वारा ऐसा किया जाना गाँधी जी की कल्पना से बाहर था। परंतु सांचा ढाला जा चुका था। विरोध की चिंगारी जलाई जा चुकी थी। साक्षात्कार ने गाँधी और अम्बेडकर के बीच एक युद्ध के प्रारंभ का संकेत दिया!

तथापि, यहाँ यह उल्लेख करना आश्चर्यजनक है कि गाँधी ने सोचा था कि अम्बेडकर हरिजन नहीं हैं। जब वे लंदन गए तब तक उन्होंने सोचा था कि वह कोई ब्राह्मण हैं, जिसने हरिजनों में गहरी दिलचस्पी ली है और इसीलिए असंयमित रूप से बातचीत की। *

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‘‘डॉ. अम्बेडकर की श्री गाँधी से मुलाकात

दलित वर्ग के नेता डॉ. अम्बेडकर ने शुक्रवार अपराह्न में श्री गाँधी से मुलाकात की। उन्होंने श्री गाँधी को अपनी इस बात से अवगत कराने का प्रयास किया कि कांग्रेस ने अभी तक दलित वर्गों के लिए प्रत्यक्ष में कुछ नहीं किया है और श्री गाँधी यह कल्पना करने के भ्रम में हैं कि लोगों के प्रतिनिधि के रूप में दलित वर्ग उनके पीछे है। श्री गाँधी ने यह नहीं माना कि कांग्रेस ने दलित वर्गों के लिए कुछ भी नहीं किया था अथवा कुछ भी नहीं कर रही है। डॉ. अम्बेडकर अंततः श्री गाँधी को आश्वस्त किए बिना अथवा उनके द्वारा आश्वस्त हुए बिना चले गए।’’ ख्1,

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‘‘श्री गाँधी की मूर्खता पर डॉ. अम्बेडकर

दलित वर्ग के प्रतिनिधि डॉ. बी.आर. अम्बेडकर, जिनकी दलित वर्गों के प्रति अपनी प्रवृत्ति के बारे में पिछले दिन श्री गांधी से स्पष्ट बातचीत हुई थी, का द टाइम्स ऑफ इंडिया, के प्रतिनिधि द्वारा साक्षात्कार लिया गया था, जिसमें उन्होंने कहा था ‘‘भारत के हितों से ऊपर बारदोली के हितों को रखना और उस आधार पर गोल मेज सम्मेलन की वार्ता में भाग लेने के लिए इंग्लैंड जाने से मना करना मुझे मूर्खता की पराकाष्ठा प्रतीत होती है। ग्राम अधिकारियों के छुट-पुट अत्याचारों के बारे में ध्यान देना और बड़ी समस्याओं, जिनका निपटारा हमें उन अधिकारियों पर नियंत्रण रखने में समर्थ

* 1. महादेव देसाई की डायरी, खंडः1, नवजीवन पब्लिशिंग हाउस, पृष्ठ 32 ।दि टाइम्स ऑफ इंडिया, दिनांक 15 अगस्त, 1931 ।