66 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
‘‘सिफारिश का सारांश
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खंड-
बंबई प्रेसीडेंसी से कर्नाटक अथवा सिंध का कोई पृथक्करण नहीं होना चाहिए।
खंड-
अध्याय 1 - इस परंतुक के अधीन रहते हुए प्रांतीय कार्यपालिका का यह पूर्ण उत्तरदायित्व होना चाहिए कि अगर विधानमंडल सदस्य इसे एक आरक्षित विषय बनाने का संकल्प लेते हैं तो उनके संकल्प को प्रभावी बनाया जाएगा।
अध्याय 2 - किसी भी परिस्थिति में कार्यपालिका को न हटाये जाने योगय नहीं बनाया जाना चाहिए। कार्यपालिका में कोई सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व नहीं होगा। मंत्रीगण गैर-कानूनी कार्यों के लिए न्यायालयों के अधीन होंगे। संविधान को मंत्रियों के दोषारोपण की व्यवस्था करनी चाहिए। कार्यपालिका में संयुक्त उत्तरदायित्व होना चाहिए। कार्यपालिका की अध्यक्षता प्रधान मंत्री द्वारा की जानी चाहिए न कि राज्यपाल द्वारा।
अध्याय 3 - राज्यपाल का पद संवैधानिक प्रमुख का होना चाहिए। उसके पास आपातकालीन शक्तियां नहीं होनी चाहिएँ।
खंड-
अध्याय 1-प्रौढ़ मताधिकार होना चाहिए।
अध्याय 2 - विधानमंडल पूर्णतः निर्वाचित होना चाहिए। यूरोपीय लोगों को छोड़कर, सभी वर्ग और सांप्रदायिक मतदाताओं को समाप्त किया जाना चाहिए। मुसलमानों, दलित वर्गों और एंग्लो-इंडियन तथा गैर-ब्राह्मणों को केवल तभी आरक्षित सीटें प्रदान की जानी चाहिएँ अगर मताधिकार प्रतिबंधित हो।
अध्याय 3 - विधानमंडल में 140 सदस्य होने चाहिए। इनमें से 33 मुसलमान और 15 दलित वर्ग के होने चाहिएं। कतिपय जिलों के कम प्रतिनिधित्व और अन्य के अति-प्रतिनिधित्व को जनसंख्या के आधार पर सुधारा जाना चाहिए। विभिन्न वर्गों और हितों के बीच सीटों के समायोजन के लिए एक समिति होनी चाहिए। किसी उम्मीदवार के लिए आवासीय योग्यता की अपेक्षा हटा दी जानी चाहिए।
अध्याय 4 - लखनऊ समझौता स्थायी व्यवस्था नहीं है और उससे उत्पन्न नए और