खण्ड - III अछूतों को भारत के राजनीतिक क्षितिज पर लाने और भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला रखने में डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की भूमिका - Page 84

67

उनके अपने गुणागुण पर उत्पन्न प्रश्नों पर विचार करना निवारित नहीं हो सकता।

अध्याय 5 - प्रांत में कोई दूसरा सदन नहीं होना चाहिए।

अध्याय 6 - विधानमंडल को अध्यक्ष को नियुक्त करने और हटाने, उसके विशेषाधिकारों को पारिभाषित करने तथा उसकी कार्यविधियों को विनियमित करने की शक्ति होनी चाहिए। भारत शासन अधिनियम की धारा 72घ और 80ग को संविधि से हटा दिया जाना चाहिए। विधानमंडल को ‘‘अविश्वास प्रस्ताव’’ लाने की शक्ति होनी चाहिए। विधानमंडल को कतिपय शर्तों के अधीन रहते हुए संविधान को परिवर्तित करने की शक्ति होनी चाहिए।

खंड-

अध्याय 1 - पूर्ण प्रांतीय स्वायत्तता होनी चाहिए। केंद्र और प्रांत के बीच कार्यों के विभाजन पर पिछली स्वीकृति और परवर्ती वीटो की प्रणाली के माध्यम से अभी प्रवर्तित केंद्र सरकार के नियंत्रण को हटाने की दृष्टि से पुनर्विचार किया जाना चाहिए।

अध्याय 2 - प्रांतीय सरकार को सौंपे गए कार्यों द्वारा नियत सीमाओं के भीतर उस सरकार और गृह सरकार के बीच संबंध सीधा होना चाहिए न कि केंद्र सरकार के माध्यम से। भारत शासन अधिनियम की धारा 2 को हटा दिया जाना चाहिए क्योंकि यह भारत सरकार के संबंध में क्राउन की स्थिति को अस्पष्ट करती है।

खंड-

एक स्पष्ट प्रांतीय सिविल सेवा होनी चाहिए और सेक्रेटरी ऑफ स्टेट को भर्ती एजेंसी का कार्य निष्पादित करने बंद कर देना चाहिए। सेवाओं से संबंधित उसका कार्य प्रांतीय सिविल सेवा आयोग अथवा भारत के लोक सेवा आयोग के साथ संयुक्त रूप से कार्यरत अधिकारी द्वारा निष्पादित किया जा सकता है। सेवाओं का भारतीयकरण अधिक तीव्र गति से होना चाहिए। उसकी गति राज्य के विभिन्न विभागों की प्रकृति से भिन्न होनी चाहिए। भारतीयकरण के साथ वेतन और भत्ते का भिन्न पैमाना होना चाहिए। सेवाओं के भारतीयकरण के क्रम में पिछड़े वर्गों के दावों की पूर्ति के लिए व्यवस्था की जानी चाहिए।’’ ख्1,

-डॉ. बी. आर. अम्बेडकर

17 मई, 1929

  1. लेख और भाषण, खंड 2, पृष्ठ 400-01 ।