खण्ड - III अछूतों को भारत के राजनीतिक क्षितिज पर लाने और भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला रखने में डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की भूमिका - Page 87

70 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

राजनेता नया भारतीय रियासतों के शासक नहीं मिले हैं, जैसा कि अब आप भारत के शासन की भावी प्रणाली पर चर्चा करने और मेरी संसद, जिसकी आधारशिला पर यह रखी जाएगी, के लिए सहमति मांगने के लिए एक मेज पर मिल रहे हैं।’’ सम्राट ने यह आशा व्यक्त करते हुए अपना वक्तव्य समाप्त किया : ‘‘आपका नाम उन लोगों की तरह इतिहास में दर्ज हो जिन्होंने भारत की भलीभांति सेवा की हैं‘‘। सम्राट के सदन से जाने के बाद रामसे मैकडोनाल्ड को सर्वसम्मति से गोल मेज सम्मेलन का अध्यक्ष निर्वाचित किया गया। श्रमिक नेता और ‘‘द गवर्नमेंट ऑफ इंडिया’’ के लेखक, उन्होंने भारतीय समस्या को हल करने के लिए ब्रिटेन की दृढ़प्रतिज्ञा व्यक्त की और कहा कि वे एक नए इतिहास को जन्म लेते हुए देख रहे हैं।

गोल मेज सम्मेलन संविधान का प्रारूप तैयार करने का कार्य करने वाली संविधान सभा नहीं था। यह भारतीय और ब्रिटिश राजनेताओं, जिन्हें मतदान द्वारा निर्णय नहीं लेना था, की एक सभा थी। मुख्य मुद्दों पर, जो विचारार्थ उसके समक्ष आए, सम्मेलन की भावना अभिनिश्चत और दर्ज की जानी थी।

इसके बाद सम्मेलन का स्थल सेंट जेम्स पैलेस में स्थानांतरित हो गया। सामान्य चर्चा, जो 17 नवम्बर से 21 नवम्बर तक हुई, के दौरान सप्रू, जयकर, मुंजे, जिन्ना, बीकानेर के महाराजा और डॉ. अम्बेडकर ने बहुत निष्ठापूर्ण और प्रभावशाली भाषण दिये। अपनी सुबोध और आकर्षक शैली में सम्मेलन के मार्गनिर्देशक, मित्र और दार्शनिक सर तेज बहादुर स्रपू ने कहा : ‘‘भारत ब्रिटिश राष्ट्रमंडल के सभी तीन सदस्यों के साथ समानता का स्तर प्राप्त करना चाहता है और वह उसकी प्राप्ति के लिए दृढ़प्रतिज्ञ हैं - ऐसी समानता, जो उसे आम जनता की आवाज के प्रति मात्र उत्तरदायित्वपरक ही नहीं बल्कि उत्तरदायी शासन देगी।’’

बीकानेर के महाराजा ने स्वयं को और रियासतों के प्रमुखों को ब्रिटिश भारत की आकांक्षाओं के संदर्भ में देखा तथा घोषित किया कि रियासतों के राजा स्व-शासित संघीय ब्रिटिश भारत के साथ स्वयं अपनी मुक्त इच्छा से संघबद्ध होने के लिए तैयार हैं। यह सभी के लिए एक अचंभा था। संघ की इस घोषणा का समर्थन पटियाला के महाराजा और भोपाल के नवाब द्वारा भी किया गया।

मुसलमान सदस्यों ने अखिल भारतीय संघ का स्वागत किया; परंतु अत्यधिक उत्साह के साथ उन्होंने उत्तर-पश्चिम प्रांत को ब्रिटिश भारत की अन्य प्रांतीय इकाइयों के समान स्तर प्रदान करने तथा सिंध के पृथक प्रांत के सृजन के लिए दबाब डाला।

जयकर ने अपने भाषण के गहन और मधुर प्रवाह से डोमिनियन स्टेटस की