खण्ड - III अछूतों को भारत के राजनीतिक क्षितिज पर लाने और भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला रखने में डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की भूमिका - Page 88

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घोषणा करने की मांग की : ‘‘अगर आज आप भारत को डोमिनियन स्टेटस देते हैं तो कुछ महीनों में स्वाधीनता की आवाज उठनी स्वयं बंद हो जाएगी। अगर दूसरी ओर हम सम्मेलन में अपने खाली हाथ लौटते हैं तो यह स्वाधीनता की मांग इतनी मात्रा और तीव्रता में उठाने का निश्चित तरीका होगा।

डॉ. मुंजे ने पटियाला के महाराजा का अनुसरण करते हुए लॉर्ड पील के सभी तर्कों का खंडन किया और सम्मेलन को बताया कि ब्रिटिश सरकार ने कैसे भारतीय नौवहन, कपास तथा अन्य उद्योगों को कुचला है। उन्होंने आगे कहा कि ब्रिटिश शासन का यह विश्वास कि वे बल प्रदर्शन द्वारा नागरिक अवज्ञा के राष्ट्रीय आंदोलन को दबा देंगे, भ्रांतिपूर्ण है; वह समय गुजर चुका है।

एन. एम. जोशी ने नए संविधान में श्रमिकों के लिए अधिक अधिकारों की वकालत की। सर मिर्जा ने कहा कि भावी संविधान संघीय आधार पर आधारित होना चाहिए। सर सी. पी. रामास्वामी अय्यर ने राय व्यक्त की कि भावी संविधान उसके अधीन रहने योग्य होना चाहिए। तब, दो अथवा तीन वक्ताओं के बाद चमकती हुई आंखों और कसे हुए होठों वाला एक मजबूत कद-काठी, सौम्य और आत्मविश्वास से परिपूर्ण व्यक्ति उठा। केवल अपने मानसिक और नैतिक बल द्वारा निम्नतम स्तर से ऊंचाई तक उठा वह व्यक्ति राजकुमारों और राजाओं, विधिवेत्ताओं और महान राजसिंहासनों, जागीरों, संस्थानों और हितों का प्रतिनिधित्व कर रहे महान बुद्धिमानों की सभा में बैठा था। वह भारत के सबसे गरीबों, जो अधनंगे और मूक थे, का प्रतिनिधित्व कर रहा था। वह अब क्या कहेगा? वह इसे कैसे कहेगा? सभा में एक शासक था, जिसने उसकी शिक्षा का वित्तपोषण किया था। उनमें से एक वह था, जो स्कूल में उसका शिक्षक था। सभी आंखें वक्ता पर केंद्रित थीं। वह बिल्कुल घबड़ाया हुआ नहीं था। वह अपने दिमाग से परिचित था; वह जानता था, उसे क्या कहना और कैसे कहना है। प्रधान मंत्री मैकडोनाल्ड और जोशी को छोड़कर उस सम्माननीय सभा में किसी ने भी निर्धनता को उसके अशिष्टतम और कुरूपतम रूप में नहीं देखा था। सम्मेलन में विशिष्ट व्यक्ति, विद्वान और साहित्यकार थे, परंतु वह एकमात्र नेता था, जिसने शैक्षिक जगत में उच्चतम डिग्री, विज्ञान में डॉक्टरेट प्राप्त की थी। यह व्यक्ति भारत में दलित मनुष्यों का नेता, डॉ. अम्बेडकर था।

प्रारंभ में, डॉ. अम्बेडकर ने घोषित किया कि सम्मेलन के समक्ष बोलते समय, वह ब्रिटिश भारत की कुल जनसंख्या के पांचवे हिस्से- जो इंग्लैंड अथवा फ्रांस की जनसंख्या के बराबर है और जो एक दास से भी खराब स्थिति में आ गया है, के विचार रख रहे है। उन्होंने तब सभी को अचंभित करते हुए घोषित किया कि भारत में अछूत भी मौजूदा सरकार के स्थान पर जनता द्वारा और जनता के लिए, जनता की सरकार