72 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
के पक्ष में है। उन्होंने कहा कि भारत में ब्रिटिश शासन के प्रति अछूतों की प्रवृत्ति में यह परिवर्तन आश्चर्यजनक और महत्वपूर्ण घटना है। अपनी बात का औचित्य देते हुए उन्होंने अपनी वाणी में ओज और आंखों में चमक लाते हुए विचार व्यक्त किए : ‘‘जब हम अपनी वर्तमान स्थिति की तुलना ब्रिटिश पूर्व दिनों के भारतीय समाज में अपने भाग्य से करते हैं तब हम पाते हैं कि आगे चलने की बजाय हम समय का आकलन कर रहे हैं। ब्रिटिशों के पूर्व हम छूआछूत के कारण घृणित दशा में थे। क्या ब्रिटिश सरकार ने इसे हटाने के लिए कुछ किया? ब्रिटिश के पूर्व हम गांव के कुएं से पानी नहीं ले सकते थे। क्या ब्रिटिश सरकार ने कुंए के हमारे अधिकार प्राप्त कराए? अंग्रेजों के शासन से पूर्व हम मंदिर में नहीं जा सकते थे। क्या अब हम प्रवेश कर सकते हैं? ब्रिटिश के पूर्व हमें पुलिस बल में प्रवेश करने से मनाही थी। क्या ब्रिटिश सरकार ने हमें बल में प्रवेश दिलाया? ब्रिटिश के पूर्व हमें मंत्रालय में सेवा करने की अनुमति नहीं दी जाती थी। क्या अब वह जीवनवृत्ति हमारे लिए खुली है? क्या हम इन किन्हीं प्रश्नों का निश्चयात्मक उत्तर दे सकते हैं। हमारी गलतियां खुले घावों की तरह बनी रहीं और उन्हें ठीक नहीं किया गया, यद्यपि ब्रिटिश शासन के 150 वर्ष गुजर चुके हैं।
‘‘ऐसी सरकार ने किसी की क्या भलाई की है?’’ उन्होंने सम्मेलन से पूछा। इस पर ब्रिटिश प्रतिनिधिगण एक-दूसरे की ओर देखने लगे। भारतीय प्रतिनिधियों के बीच एक उत्तेजनामय वातावरण था। डॉ. अम्बेडकर ने आगे कहा, यह ऐसी सरकार है, जो मानती है कि पूंजीपति कामगारों को आजीविका के लिए उचित मजदूरी और कार्य की अच्छी दशाएं नहीं दे रहे हैं और जमींदार जनता को निचोड़ रहे हैं और फिर भी इसने उन सामाजिक बुराईयों को नहीं हटाया, जिन्होंने अनेक वर्षों से दलित वर्गों के जीवन को नष्ट कर रखा है। उन्होंने आगे कहा कि यद्यपि इसे इन बुराईयों को हटाने की कानूनी शक्तियां हैं फिर भी इसने जीवन की मौज्ूदा सामाजिक और आर्थिक संहिता संशोधित नहीं की, क्योंकि उसे भय था कि उसके हस्तक्षेप से प्रतिरोध उत्पन्न होगा। इसलिए उन्होंने घोषणा की : हमारी ऐसी सरकार होनी चाहिए, जिसमें रहने वाले व्यक्ति देश के सर्वोत्तम हित में अपनी अखंड निष्ठा रखें। हमारी ऐसी सरकार होनी चाहिए, जिसमें सत्तारूढ़ व्यक्ति यह जानते हों कि आज्ञा पालन कहां समाप्त होगा और प्रतिरोध कहां प्रारंभ होगा; और वे जीवन की सामाजिक एवं आर्थिक संहिता, को जिसके लिए न्याय और समीचीनता की आज्ञाओं की अपेक्षा थी, संशोधित करने से भयभीत नहीं होंगे।
डॉ. अम्बेडकर ने डीनियम स्टेटस के स्तर की मांग की परिपुष्टि की, परंतु यह संदेह व्यक्त किया कि क्या दलित वर्ग इसके उत्तराधिकारी होंगे जब तक नए संविधान के लिए राजनीतिक तंत्र विशेष रूप का न हो। उस संविधान को बनाते