खण्ड - III अछूतों को भारत के राजनीतिक क्षितिज पर लाने और भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला रखने में डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की भूमिका - Page 90

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समय, उन्होंने मत व्यक्त किया, यह देखा जाना चाहिए कि भारतीय समाज, जो सम्मान के आरोही और अवमानता के अवरोही क्रम से निर्मित है और जो जातियों का श्रेणीकरण है, समानता और भातृत्व की भावना के विकास की कोई गुंजाईश प्रदान नहीं करता और बुद्धिजीवी वर्ग ने जो उच्च स्तर से आए हैं तथा जिन्होंने राजनीतिक आंदोलन चलाया है, जातियों के अपने संकीर्ण पक्षपात को नहीं छोड़ा है। इसलिए उन्होंने बलपूर्वक कहाः ‘‘हम महसूस करते हैं कि कोई भी हमारी शिकायतें दूर नहीं कर सकता जितनी अच्छी तरह हम कर सकते हैं और हम उन्हें तब तक दूर नहीं कर सकते जब तक हम स्वयं अपने हाथों में राजनीतिक शक्तियां प्राप्त नहीं करते। मैं समझता हूं दलित वर्गों ने समय को अपना चमत्कार दिखाने के लिए बहुत लम्बी प्रतीक्षा की है।’’

भारतीय गतिरोध का हवाला देते हुए उन्होंने एडमंड बर्के के जिन्हें वे राजनीतिक दर्शनशास्त्र का महानतम शिक्षक कहते थे, स्मरणीय शब्दों को याद किया कि ‘‘बल प्रयोग अस्थायी होता है।’’ अपना ओजस्वी भाषण समाप्त करते हुए उन्होंने ब्रिटिश सरकार और उन्हें, जो सम्मेलन में ‘‘वाक् और विचार युद्ध’’ में संलग्न थे, चेतावनी दीः मुझे भय है कि यह पर्याप्त महसूस नहीं किया गया है कि देश की वर्तमान स्थिति में कोई भी ऐसा संविधान व्यवहार्य नहीं होगा, जो बहुसंख्यक लोगों को स्वीकार्य नहीं है। वह समय चला गया है जब आपको चयन करना था और भारत को स्वीकार करना था; वह समय कभी वापस नहीं आने वाला है। अगर आप चाहते हैं कि नया संविधान काम करे तो लोगों की सहमति को नए संविधान की कसौटी बनाइए न कि तर्क को।’’

भाषण में निडर स्वर और निर्भीक आलोचना का सम्मेलन पर अद्भुत प्रभाव पड़ा। जिससे बेबाकीपन और निर्भीकता से डॉ. अम्बेडकर ने सुदृढ़तापूर्वक सम्मेलन के समक्ष तथ्य रखे, उन्होंने प्रतिनिधियों को अत्यधिक प्रभावित किया और उन्होंने उनके ओजस्वी भाषण पर उन्हें बधाई दी। इसने ब्रिटिश प्रधान मंत्री पर अच्छा प्रभाव डाला। ‘‘दि इंडियन डेली मेल’’ ने इस भाषण का उल्लेख संपूर्ण सम्मेलन के दौरान एक सर्वोत्कृष्ट वाक्पटुता के रूप में किया। सम्मेलन में एक व्यक्ति उनके भाषण से अत्यधिक प्रसन्न था। वे प्रशंसा, संतुष्टि और अत्यधिक सराहना से परिपूर्ण अपने राजमहल पहुंचे और अपनी आंखों में खुशी के आंसुओं सहित उन्होंने अपनी रानी से कहा कि उस दिन के वक्ता पर व्यय की गई धनराशि और उनके प्रयास सभी वसूल हो गए। यह एक

*# भारतीय गोल मेज सम्मेलन, 1930-31, कार्यवाही पृष्ठ 123-29 । गोल मेज सम्मेलन में डॉ बी. आर. अम्बेडकर का भाषण। डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर के लेख और

भाषण, खंड 2 देखिए - संपादक