खण्ड - III अछूतों को भारत के राजनीतिक क्षितिज पर लाने और भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला रखने में डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की भूमिका - Page 91

74 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

उपलब्धि, एक महान सफलता थी। यह प्रशंसक और कोई नहीं बड़ौदा के महामहिम महाराजा थे, जिन्होंने अपने पसंदीदा मित्रों के लिए लंदन में अपने द्वारा दिए गए विशेष रात्रि भोज में डॉ. अम्बेडकर को आमंत्रित किया था। यह भाग्य की विचित्र लीला थी कि गायकवाड और अम्बेडकर अतिनाटकीय स्थिति में वर्षों के मनमुटाव के बाद मिले।

डॉ. अम्बेडकर के इस ओजपूर्ण भाषण का समाचारपत्रों पर भी अभूतपूर्व प्रभाव पड़ा। अंग्रेजी समाचारपत्रों और संवाददाताओं ने दलित वर्ग के नेता और लॉर्ड सिन्डेनहाम ओडायर तथा अन्य अंग्रेज राजनेता, जिन्होंने ‘स्पेक्टेटर’ में डॉ. अम्बेडकर के भाषण की तीखी आलोचना की थी, का ध्यान आकर्षित किया, वे अब पूर्णतः आश्वस्त थे कि डॉ. अम्बेडकर राष्ट्रवादी हैं और इसीलिए उन्होंने यह कहना शुरू किया कि वे भी भारत के क्रांतिकारी नेताओं में से एक हैं। कुछ अंग्रेज राजनेताओं ने विश्वासपूर्ण तरीके से ए.बी. लाठे से पूछा कि क्या डॉ. अम्बेडकर क्रांतिकारी खेमे से संबंधित हैं। ब्रिटिश राजनेताओं की ओर से यह पूछताछ अप्रत्याशित नहीं थी। स्मरण रहे ब्रिटिश गुप्त पुलिस ने उस समय डॉ. अम्बेडकर की पूरी तलाशी ली थी जब वे वर्ष 1917 में अमरीका से ब्रिटेन आए थे।

सम्मेलन की प्रारंभिक अवधि के दौरान उदारवादी नेताओं : सप्रू, शास्त्री और सीतलवाड द्वारा सांप्रदायिक प्रश्न पर मुसलमान प्रतिनिधियों के साथ सहमति बनाने का प्रयास किया गया था। हिन्दू प्रतिनिधियों ने सर कावसजी जहांगीर के निवास-स्थान पर शास्त्री की अध्यक्षता में मुसलमान प्रतिनिधियों के साथ समझौते की संभावना पर चर्चा करने के लिए बैठकें आयोजित कीं। मुंजे और जयकर ने यह विचार व्यक्त किया कि ऐसा समझौता डोमिनियन स्टेटस प्राप्त करने के बाद संभव होगा। उदारवादी नेता जयकर, मुंजे और अम्बेडकर ने भोपाल के नवाब, आगा खान, जिन्ना और अन्य के साथ भोपाल के नवाब के निवास-स्थान पर विचार-विमर्श किया, परंतु सिंध के पृथक्करण के लिए मुसलमानों की मांग पर जिसका मुंजे और जयकर द्वारा घोर विरोध किया गया था, पर वार्ता भंग हो गई। इसके अतिरिक्त, मुसलमान नेता मुसलमान बहुल प्रांतों में हिन्दुओं और सिखों को आरक्षित सीट का समान अनुपात देने के लिए तैयार नहीं थे, जैसा उन्होंने अन्य प्रांतों में अपने लिए मांगा था।

इस विचार-विमर्श सत्र में सामान्य चर्चा के बाद सम्मेलन ने नौ उप-समितियां नियुक्त कीं और डॉ. अम्बेडकर को संघीय संरचना समिति को छोड़कर लगभग सभी महत्वपूर्ण उप-समितियों में सदस्य के रूप में स्थान प्राप्त हुआ। वे अल्पसंख्यक उप-समिति, प्रांतीय उप-समिति और सेवा उप-समिति में थे, जिनमें उनके साथ भारत और इंग्लैंड के प्रकांड विद्वान भी थे। प्रांतीय उप-समिति की रिपोर्ट पर चर्चा के क्रम में डॉ. अम्बेडकर ने चिंतामणि के इस विचार का समर्थन किया कि भारत के किसी भी प्रांत में दूसरा सदन होना पूर्णतः अनावश्यक और अवांछनीय है।