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रक्षा समिति की रिपोर्ट पर चर्चा के समय डॉ. अम्बेडकर ने वकालत की कि सेना में भर्ती को क्षमता और आवश्यक योग्यता के आधार पर सभी भारतीयों के लिए बराबर खुले रहना चाहिए।
अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए डॉ. अम्बेडकर द्वारा जो सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्य किया गया वह दलित वर्गों के सांस्कृतिक, धार्मिक और आर्थिक अधिकारों की रक्षा करते हुए बुनियादी अधिकारों की घोषणा तैयार करना था। उन्होंने अत्यधिक परिश्रम और कूटनीतिज्ञता के साथ यह स्कीम तैयार की और उसे भारत के भावी संविधान में शामिल करने के लिए अल्पसंख्यक उप-समिति को प्रस्तुत किया। इस स्कीम का शीर्षक ‘‘स्व-शासित भारत के भावी संविधान में दलित वर्गों के संरक्षण के लिए राजनीतिक सुरक्षोपाय की स्कीम था।’’ ख्1,
डॉ. बी. आर. अम्बेडकर द्वारा तैयार ज्ञापन का पाठ उसकी पृष्ठभूमि के साथ निम्नानुसार है - संपादक।
‘‘दिनांक 12 नवम्बर, 1930 को महामहिम सम्राट जॉर्ज पंचम ने औपचारिक रूप से भारतीय गोल मेज सम्मेलन का उद्घाटन किया। भारतीयों के दृष्टिकोण से गोल मेज सम्मेलन अत्यधिक महत्वपूर्ण घटना थी। इसका महत्व महामहिम की सरकार द्वारा भारत के लिए संविधान तैयार करने के मामलों में परामर्श किए जाने हेतु भारतीयों के अधिकार को मान्यता देने में निहित है। अछूतों के लिए यह उनके इतिहास में एक मील का पत्थर था। अछूतों को पहली बार दो प्रतिनिधियों, जिनमें स्वयं मैं और दीवान बहादुर आर. श्रीनिवासन शामिल थे, द्वारा अलग-अलग प्रतिनिधित्व करने की अनुमति दी गई थी। इसका अर्थ यह है कि अछूतों को हिन्दुओं से मात्र पृथक ही नहीं माना गया था बल्कि इतना महत्वपूर्ण भी माना गया था कि उन्हें भारत का संविधान तैयार करने में परामर्श देने का अधिकार है।
सम्मेलन के कार्य को नौ समितियों में वितरित किया गया था। इन समितियों में से एक अल्पसंख्यक समिति थी, जिसे सांप्रदायिक प्रश्न का समाधान खोजने का सर्वाधिक कठिन कार्य सौंपा गया था। यह पूर्वानुमान करते हुए कि यह समिति सर्वाधिक महत्वपूर्ण समिति है, प्रधान मंत्री, स्वर्गीय श्री रामसे मैकडोनाल्ड ने स्वयं इसकी अध्यक्षता ग्रहण की। अल्पसंख्यक समिति की कार्यवाही अछूतों के लिए अत्यधिक महत्व की है क्योंकि कांग्रेस और अछूतों के बीच जो अधिकांश हुआ था और जिससे उनके बीच कटुता उत्पन्न हुई थी, वह उस समिति की कार्यवाही में पाई जाएगी।
- कीर पृष्ठ 144-153 ।