76 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
जब गोल मेज सम्मेलन ने अछूतों से भिन्न समुदायों की राजनीतिक मांगे पूरी कीं तब यह सुविदित था। वास्तव में वर्ष 1919 के संविधान ने उन्हें सांविधिक अल्पसंख्यकों के रूप में मान्यता दी थी और उनकी सुरक्षा और संरक्षण के प्रावधान उसमें अंतर्निहित किए गए थे। उनके मामले में प्रश्न उन प्रावधानों का विस्तार करना अथवा उनके आकार को परिवर्तित करना था। दलित वर्गों के संबंध में स्थिति भिन्न थी। मोंटेग-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट में जो वर्ष 1919 के संविधान के पूर्व आई थी, बिल्कुल स्पष्ट रूप से कहा था कि उनके संरक्षण के लिए संविधान में प्रावधान अवश्य किए जाने चाहिएं। परंतु दुर्भाग्यवश, जब संविधान के ब्यौरे तैयार किए गए, तो भारत सरकार ने नामांकन द्वारा विधानमंडल में उन्हें सांकेतिक प्रतिनिधित्व मात्र देकर उनके संरक्षण के लिए कोई प्रावधान तैयार करना कठिन पाया। पहली बात जिसे करने की अपेक्षा थी, वह हिन्दुओं की निरंकुशता और उत्पीड़न के विरुद्ध अपने संरक्षण के लिए अछूतों द्वारा आवश्यक समझे गए रक्षोपाय तैयार करना था। इसे मैंने गोल मेज सम्मेलन की अल्पसंख्यक समिति को एक ज्ञापन के रूप में प्रस्तुत कर दिया। उन रक्षोपायों की जिन्हें मेरे द्वारा तैयार किया गया था, जानकारी देने के लिए मैं ज्ञापन का पाठ नीचे पुनः प्रस्तुत करता हूं :-
स्व-शासित भारत के भावी संविधान में दलित वर्गों के संरक्षण के लिए राजनीतिक रक्षोपायों की एक स्कीम भारतीय गोल मेज सम्मेलन में प्रस्तुत की गई!
वे शर्तें निम्नलिखित हैं, जिन पर दलित वर्ग स्व-शासित भारत में बहुसंख्यक शासन के अधीन स्वयं को रखने की सहमति देंगे।
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शर्त संख्या 1
समान नागरिकता
दलित वर्ग वंशानुगत दासता की अपनी वर्तमान दशा में स्वयं को बहुसंख्यक शासन के अधीन रखने की सहमति नहीं दे सकता। बहुसंख्यक शासन स्थापित होने के पूर्व छूआछूत की प्रथा से मुक्ति का काम एक पूरा किया गया तथ्य होना चाहिए। इसे बहुसंख्यक की इच्छा पर नहीं छोड़ा जाना चाहिए। दलित वर्गों को राज्य के अन्य नागरिकों के साथ साझा नागरिकता के सभी अधिकारों के लिए हकदार स्वतंत्र नागरिक बनाया जाना चाहिए।
(क) अस्पृश्यता का अंत सुनिश्चित करने और समान नागरिकता सृजित करने
के लिए यह प्रस्तावित है कि निम्नलिखित मूल अधिकारों को भारत के
संविधान का अंग बनाया जाएगा।