खण्ड - III अछूतों को भारत के राजनीतिक क्षितिज पर लाने और भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला रखने में डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की भूमिका - Page 94

मूल अधिकार

यू.एस.ए. (सं.रा.अ.) संविधान संषोधन XIV और आयरलैंड शासन अधिनियम, 1920, 1 और 11 जियो. V, अध्याय 67, धारा 5(2)

सभी संविधानों में ऐसा ही है। सीएम 207, पृष्ठ 56 में प्रोफेसर कीथ की अभ्युक्तियां देखिए।

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मूल अधिकार

‘‘भारत में राज्य के सभी लोग कानून के समक्ष बराबर हैं और समान नागरिक अधिकार रखते हैं। किसी मौजूदा अधिनियम, विनियम, आदेश, प्रथा अथवा कानून की व्याख्या का, जिसके द्वारा कोई शास्ति, हानि, निःशक्तता छूआछूत के कारण राज्य के किसी व्यक्ति पर अधिरोपित की जाती है या उसके साथ भेदभाव किया जाता है, जिस दिन से यह संविधान प्रवृत्त होता है, भारत में प्रभवी होना बंद हो जाएगा।

(ख) भारत सरकार अधिनियम, 1919 की धारा 110 और 111 के फलस्वरूप कार्यपालक अधिकारियों द्वारा प्राप्त उन्मुक्तियों और छूटों को समाप्त करना और कार्रवाई के लिए उनके दायित्व को यूरोपीय ब्रिटिश प्रजा के मामले के समविस्तीर्ण बनाना।

शर्त संख्या
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समान अधिकारों का निर्वाध उपभोग

दलित वर्गों के लिए समान अधिकारों की घोषणा का कोई अर्थ नहीं है। इसमें संदेह नहीं हो सकता कि दलित वर्गों को रूढि़वादी समाज के संपूर्ण बल का सामना करना होगा अगर वे नागरिकता के समान अधिकारों का प्रयोग करने का प्रयास करते हैं। इसलिए दलित वर्ग महसूस करता है कि अगर अधिकारों की ये घोषणाएं मात्र पवित्र उद्घोषणा नहीं होती हैं, अपितु प्रतिदिन के जीवन की वास्तविकताएं होती हैं तो उनका इन घोषित अधिकारों का उपयोग करने में हस्तक्षेप से पर्याप्त कष्टों और शास्तियों द्वारा संरक्षण किया जाना चाहिए।

(क) इसलिए दलित वर्ग यह प्रस्ताव करते हैं कि अपराधों, कार्यविधि और शास्तियों

के विषय में भारत अधिनियम, 1919 के भाग XI में निम्नलिखित धाराएं जोड़ी

जानी चाहिएं :-