खण्ड - III अछूतों को भारत के राजनीतिक क्षितिज पर लाने और भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला रखने में डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की भूमिका - Page 96

79

जाने के खतरे ने रूढि़वादी वर्गों द्वारा हिंसा के प्रयोग पर रोक लगाई है और इसके फलस्वरूप ऐसे मामले बिरले ही हैं।

‘‘दूसरी कठिनाई उस आर्थिक स्थिति से उत्पन्न होती है, जिसमें दलित वर्गों को पाया जाता है। प्रेसीडेंसी के अधिकांश भागों में दलित वर्गों को कोई आर्थिक स्वतंत्रता नहीं है। दलित वर्गों के कुछ लोग रूढि़वादी वर्गों की भूमि पर उनकी इच्छानुसार काश्तकार के रूप में खेती करते हैं। अन्य लोग रूढि़वादी वर्गों द्वारा नियोजित खेतिहर मजदूरों के रूप में प्राप्त आय से अपनी जीविका चलाते हैं और शेष रूढि़वादी वर्गों द्वारा नौकरों के रूप में उनकी सेवा के बदले दिए जाने वाले भोजन अथवा अनाज पर जीवित रहते हैं। हमने कई उदाहरण सुने हैं, जहां रूढि़वादी वर्गों ने अपने गांवों के उन दलित वर्गों के विरुद्ध हथियार के रूप में अपनी आर्थिक शक्ति का प्रयोग किया है। जब दलितों ने अपने अधिकार के प्रयोग का साहस किया है। उन्हें उनकी भूमि से बेदखल कर दिया है तथा उन्हें रोजगार देना बंद कर दिया है तथा नौकरों के रूप में उनका पारिश्रमिक रोक दिया है। यह बहिष्कार प्रायः इतने व्यापक स्तर पर योजनाबद्ध होता है कि उसमें दलित वर्गों को साझा रूप से प्रयुक्त मार्गों के प्रयोग से वंचित करना और गांव के बनिया द्वारा दैनिक जीवन की आवश्यकताओं की बिक्री रोकना शामिल होता है। साक्ष्य के अनुसार, कभी-कभी छोटे-छोटे कारण भी दलित वर्गों के विरूद्ध सामाजिक बहिष्कार की घोषणा के लिए पर्याप्त होते हैं। यह बारंबार दलित वर्गों द्वारा साझा कुंए के प्रयोग के अपने अधिकार पर भी होता है, परंतु ये मामले किसी भी प्रकार से बिरले नहीं हैं, जहां एक सख्त बहिष्कार की घोषणा मात्र इसलिए की गई है क्योंकि दलित वर्ग के व्यक्ति ने एक पवित्र धागा बांध लिया है, भूमि का टुकड़ा खरीदा है, अच्छे कपड़े अथवा गहने पहने हैं अथवा सार्वजनिक सड़क से होकर दूल्हे को घोड़े पर बैठाकर बारात निकाली है।

‘‘हम इस सामाजिक बहिष्कार से अधिक प्रभावी कोई हथियार नहीं जानते, जिसका आविष्कार दलित वर्गों को दबाने-कुचलने के लिए किया जा सकता है। खुली हिंसा की पद्धति इसके समक्ष फीकी पड़ जाती है क्योंकि उसके बहुत दूरगामी और शामक प्रभाव होते हैं। यह ज्यादा खतरनाक है, क्योंकि यह संपर्क की स्वतंत्रता के सिद्धांत के संगत विधिपूर्ण विधि के रूप में पारित होती है। हम सहमत हैं कि बहुसंख्यक की इस निरंकुशता को सख्ती से समाप्त किया जाना चाहिए अगर हमें दलित वर्गों को उनके उत्थान के लिए आवश्यक बोलने और कार्रवाई करने की स्वतंत्रता की गारंटी देनी है।

दलित वर्गों की राय में उनके अधिकारों और स्वतंत्रता के इस किस्म के जोखिम को दूर करने का एकमात्र उपाय सामाजिक बहिष्कार को कानून द्वारा दंडनीय अपराध बनाना है। इसलिए वे इस बात पर बल देने के लिए बाध्य हैं कि अपराध, प्रक्रिया और