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( ii ) यदि उसके जन्म का पंजीयन वाणिज्य दूतावास अथवा मिनिस्टर के पास जन्म
होने के दो वर्ष के भीतर अथवा ऐसी विस्तारित अवधि के भीतर किया गया
है जिसे विनियमन के अनुसरण में विशेष मामलों में मिनिस्टर द्वारा प्राधिकृत
किया गया है।” “26 कनाडाई नागरिक का ब्रिटिश प्रजा होना :-
“कनाडाई नागरिक ब्रिटिश प्रजा है।”
इन अधिनियमों में निहित योजना का उद्देश्य नागरिकता के दो वर्ग तैयार करना है - (1) राष्ट्रमण्डल नागरिक और (2) किसी विशेष राष्ट्रमण्डल का नागरिक। राष्ट्रमण्डल की नागरिकता स्वतः प्राप्त होगी। कोई भी व्यक्ति किसी विशेष राष्ट्रमण् डल का नागरिक होने के कारण एक राष्ट्रमण्डल नागरिक बन जाता है। यह कहा जाता है कि यदि प्रत्येक स्वतंत्र उपनिवेश ने वह किया है जो ब्रिटिश तथा कनाडा नागरिकता अधिनियमों में किया गया है तो एक गणराज्य के लिए भी राष्ट्रमण्डल का सदस्य बनना संभव होगा।
इस प्रस्ताव पर सहमति देने से पूर्व हमें इस पर तीन दृष्टिकोणों से विचार करना होगा। क्या यह प्रस्ताव राष्ट्रमण्डल में प्रचलित नागरिकता की मौजूदा प्रणाली में कोई परिवर्तन करने की क्षमता रखता है? यदि कोई प्रस्ताव परिवर्तन की क्षमता रखता है तो भारत को इस परिवर्तन से फायदा होगा या नुकसान होगा? तीसरे, यदि भारत राष्ट्रमण्डल से संबंध रखने का इच्छुक है तो क्या भारत इस प्रस्ताव का प्रारूप संविधान में निहित प्रावधानों के होते हुए स्वीकार कर सकता है?
राष्ट्रमण्डल में तीन दोष हैं। एक दोष इसके विदेश मामलों के संचालन से संबंधित है। विदेश मामले युद्ध का सबसे सफल स्रोत है, इसके बावजूद इनका संचालन यूनाइटेड किंगडम की सरकार पर छोड़ दिया गया था, जिसमें स्वतंत्र उपनिवेशों की कोई सक्रिय भागीदारी नहीं थी। यह सच है कि स्वतंत्र उपनिवेशों को तटस्थ रहने का अधिकार है। परन्तु यह कोई हल नहीं है क्योंकि यह ऐसा हल है जिससे राष्ट्रमण्डल के कार्यचालन में सुधार नहीं होता। यह राष्ट्रमण्डल के प्रतिकूल है। दूसरा दोष यह है कि स्वतंत्र उपनिवेशों के बीच विवादों के निपटान हेतु कोई तंत्र नहीं है। स्वतंत्र उपनिवेशों का एक-दूसरे से संबंध अलग-अलग देशों की तरह नहीं है। अतः, निपटान हेतु वे अपने विवाद अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय के समक्ष नहीं उठा सकते। इसके बावजूद स्वतंत्र उपनिवेशों के आपसी विवादों के निपटान हेतु कोई न्यायाधिकरण भी नहीं है। राष्ट्रमण्डल का तीसरा दोष यह है कि इसमें