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इसके लिए पैराग्राफ 6, 5 और 4 का अध्ययन किया जाना अपेक्षित हैः
पैराग्राफ 6 :- स्वतंत्र उपनिवेशों और सहयोगी देश के बीच संबंध की दृष्टि पैराग्राफ 6 :-
से अनावश्यक होने के कारण पैराग्राफ 6 को आसानी से हटाया जा सकता है। डी. वलेरा ने स्वयं इसे हटा दिया था, जब उन्होंने कार्यकारी प्राधिकार (विदेश संबंध) अधिनियम, 1936 के अधिनियमन द्वारा उक्त दस्तावेज में निहित सिद्धांतों को लागू किया था।
पैराग्राफ 5 :- पैराग्राफ 5 की शर्तों को यथावत् हम स्वीकार नहीं कर सकते। पैराग्राफ 5 :-
यदि ऐसा पाया जाता है कि इसे रखना जरूरी है, तो इसकी भाषा में सावधानीपूर्वक संशोधन किया जाना चाहिए। हमें विषमताओं एवं विशेषधिकारों तथा उन्मुक्तियों में भेद करना चाहिए। इस बात पर सहमत होते हुए कि विभिन्न राष्ट्रमंडल निवासियों को भारत में किसी विषमता का सामना नहीं करना पड़ेगा, हमें उन्हें भारतीय नागरिकों के लिए आरक्षित विशेषाधिकारों एवं उन्मुक्तियों का दावा करने का अधिकार नहीं देना चाहिए।
पैराग्राफ 4 :- दस्तावेज का यह पैराग्राफ दस्तावेज का सबसे अहम हिस्सा पैराग्राफ 4 :-
है। यह दस्तावेज का सर्वोत्तम भाग है। इसमें सहयोगी देश की परिभाषा दी गई है और यह स्पष्ट उल्लेख किया गया है कि यह राष्ट्रमंडल से कैसे और किस सीमा तक संबंधित है। हमारे प्रयोजन के लिए इतना पर्याप्त है। हमारा संविधान हमें राष्ट्रमंडल से निकट संबंध स्थापित करने की अनुमति नहीं देगा। हमारी जरूरतें भी हमें राष्ट्रमंडल के साथ निकट संबंध रखने की इजाजत नहीं देंगी।
- अब प्रश्न यह है कि क्या इन शर्तों पर आधारित सहयोग भारत को ब्रिटिश राष्ट्रमंडल के राष्ट्रों का सदस्य बनाने के लिए पर्याप्त माना जाएगा। जैसाकि मैंने उल्लेख किया है, दस्तावेज नं. 2 के प्रावधान आयरिश संविधान में तब शामिल किए गए थे, जब उसे 1937 में पुनः अधिनियमित किया गया था। तब यह सवाल उठाया गया था कि क्या इन परिवर्तनों के साथ आयरलैण्ड ब्रिटिश राष्ट्रमंडल का सदस्य बना रहता है। इसके उत्तर में ब्रिटिश सरकार ने दिनांक 30 दिसम्बर, 1937 को यह बयान जारी किया था -
“नए संविधान द्वारा निर्मित स्थिति पर यूनाइटेड किंगडम की हिज मजेस्टी सरकार ने विचार किया है, जिसे आयरिश स्वतंत्र देश की संसद द्वारा जून 1937 में अनुमोदित किया गया था और जो 29 दिसम्बर से प्रवष्त्त हुआ था।
“वे मानने के लिए तैयार है कि नए संविधान से आयरिश स्वतंत्र देश जिसे