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दिया गया कि अन्य स्वतंत्र उपनिवेशों द्वारा उसे विदेश के रूप में मान्यता नहीं दी गई है।
- मरी बनाम पार्क्स मामले (एईआर 1942 - जिल्द। 558) में किंग्स बेंच डिविजन के हाल में आए निर्णय को देखते हुए यह स्पष्टीकरण अत्यंत आवश्यक हो गया है। प्रश्न यह था कि आयरलैण्ड एक स्वतंत्र उपनिवेश है अथवा नहीं है। विद्वान मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि आयरलैण्ड एक स्वतंत्र उपनिवेश नहीं है और अपने इस निर्णय के समर्थन में उन्होंने दो कारण दिए -
(1) उन्हें यह जानकारी नहीं थी कि क्या आयरलैण्ड ने कभी स्पष्ट रूप से संबंध-विच्छेद के अधिकार का प्रयोग किया था, और
(2) यदि उसने ऐसा किया भी हो, तो भी प्रश्न यह है कि क्या आयरलैण्ड का संबंध-विच्छेद प्रभावी होगा जब तक कि राष्ट्रमंडल के अन्य सदस्य आयरलैण्ड को एक विदेशी देश के रूप में मान्यता नहीं देते।
मुझे कोई संदेह नहीं कि यह एक शरारतपूर्ण फैसला है। इसमें कानून से ज्यादा राजनीति है। अतः इस बारे में हमें संदेह का कोई मौका नहीं देना चाहिए कि राष्ट्रमंडल में हमारा बना रहना और उसमें से निकल जाना ऐसा मामला है जो पूर्णतः हमारे ऊपर ही निर्भर है और इस पर राष्ट्रमंडल की सहमति अनावश्यक भी है और अप्रासंगिक भी।
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- अब मैं कार्यान्वयन के प्रश्न पर आता हूँ। यहाँ दो प्रश्न विचारार्थ उत्पन्न होते हैं। घोषणा का प्रारूप और इसे कानूनी स्वीकृति प्रदान करने की विधि। जहाँ तक प्रारूप का प्रश्न है मैं निम्नलिखित मसौदा प्रस्तुत करता हूँ :-
“भारत को सामान्य सरोकार के मामलों जिनमें व्यापार, वाणिज्य, रक्षा, शांति एवं युद्ध शामिल होंगे, पर विचार विमर्श एवं स्वेच्छा के आधार पर की गई कार्रवाई के प्रयोजनार्थ ब्रिटिश राष्ट्रमंडल का सहयोगी सदस्य इस आधार पर घोषित किया जाता है कि सहयोगी के रूप में कार्य करते समय भारत के अधिकार, दर्जा व विशेषाधिकार राष्ट्रमंडल के अन्य घटक देशों में से किसी को भी प्राप्त अधिकारों, दर्जे एवं विशेषाधिकार से कम नहीं होंगे।
ऊपर उल्लिखित मुद्दों से संबंधित स्पष्टीकरणों सहित ऐसी घोषणा करना पर्याप्त होगा। यदि घोषणा की जाती है तो मुझे नहीं लगता कि हमें संविधान की उद्देशिका में “गणराज्य” शब्द में संशोधन करके उसके स्थान पर “राज्य” शब्द रखना पड़ेगा। “गणराज्य” शब्द यथावत् रहेगा।