32. संविधान और संविधानवाद - Page 114

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इस दायरे को देखते हुए संवैधानिक कानून का कानूनी न्यायशास्त्र में क्या स्थान है? प्रो. हॉलैण्ड ने इसे देश के सार्वजनिक कानून का एक भाग बताया है। इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि सही विचारधारा यही है। उनका तर्क हमें तार्किक दृष्टि से इसी निष्कर्ष पर ले आता है। कानून आचरण का एक प्रवर्तनीय नियम है जो अधिकारों से संबंधित है। जब यह एक ही राज्य के नागरिकों से संबंधित होता है यह म्युनिसिपल कानून कहलाता है। जब यह दो विभिन्न राज्यों से संबंधित होता है, यह अन्तर्राष्ट्रीय कानून कहलाता है। किसी राज्य का म्युनिसिपल कानून दो वर्गों में बंटा होता है। एक को निजी कानून कहा जाता है और दूसरे को सार्वजनिक कानून। जिन अधिकारों का प्रवर्तन एक नागरिक द्वारा दूसरे के विरुद्ध किया जाता है वे निजी कानून के अंतर्गत आते हैं। राज्य जिन अधिकारों को स्वयं पर प्रवर्तन हेतु नागरिकों पर लागू करता है, वे सार्वजनिक कानून के अन्तर्गत आते हैं। इसी प्रकार एक संघीय संगठन में राज्यों के विरुद्ध केन्द्र के पास जो अधिकार होते हैं, वे अनिवार्यतः सार्वजनिक कानून के अंतर्गत आते हैं। किसी भी दृष्टिकोण से उन्हें निजी कानून के अंतर्गत नहीं माना जा सकता।

जहाँ तक संवैधानिक कानून का संबंध एक राज्य द्वारा दूसरे राज्य के अधिकारों के दावे से अथवा राज्य द्वारा नागरिकों से और नागरिकों द्वारा राज्य से मांगे गए अधिकारों से है, संवैधानिक कानून को सार्वजनिक कानून की एक शाखा के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। संवैधानिक कानून के स्वरूप और दायरे का यह स्पष्टीकरण स्पष्ट करेगा कि केवल कुछेक शीर्षकों को विचार एवं विवेचन हेतु क्यों चुना गया है। उन्हें इसलिए चुना गया है क्योंकि उन पर किया गया विचार-विमर्श संविधान को सार्वजनिक कानून का भाग बताने और इसके विशेष लक्षणों का विवेचन करने की सर्वोत्तम विधि है।

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