96 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
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भारत के लोग अपने मूल अधिकार पहचानेंगे
भारत सरकार के कानून मंत्री डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने हैदराबाद का निरीक्षण किया। उन्होंने दिनांक 24.5.1950 को हैदराबाद प्रोग्रेसिव ग्रुप के तत्वावधान में बोर क्लब में आयोजित एक बैठक को सम्बोधित किया। संवाददाताओं और उपस्थित श्रोताओं ने उनसे संविधान, लोकतंत्र, अस्पृश्यता आदि के बारे में कुछ प्रश्न किए थे।
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भारत में संसदीय लोकतंत्र
कभी-कभी मेरे मन में विचार आता है कि भारत में लोकतंत्र का भविष्य अत्यंत अधकारमय है। परन्तु मैं यह भी नहीं कहता कि ऐसे क्षण नहीं आते जब मैं महसूस करता हूँ कि यदि हम सब मिलकर और एकजुट होकर “संवैधानिक नैतिकता” के प्रति समर्पित रहने की प्रतिज्ञा करें तो हम एक ऐसा नियमित पार्टी तंत्र तैयार करने में समर्थ होंगे जिसमें स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की भावना हो सकती है।
भारत के संविधान में निहित मूल अधिकार
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यह मान लेना गलत होगा कि मूल अधिकारों ने नागरिकों को परम अधिकार प्रदान कर दिए हैं। मूल अधिकारों के संबंध में हमारी कुछ सीमाएँ हैं जो राज्य की सुरक्षा के लिए आवश्यक हैं। संविधान का प्रारूप जब हमने तैयार किया था तो हमने इस बात का ध्यान रखा था कि मूल अधिकारों की सीमा व्यक्तिगत स्वतंत्रता को नाजायज तरीके से प्रभावित न कर सके।
मूल अधिकारों की सर्वोत्तम गारंटी संसद में एक अच्छे विपक्ष का होना है और ऐसा होने पर सरकार अपना व्यवहार उचित रखेगी।
दूसरा रक्षोपाय कानूनी था। उदाहरण के लिए- एक मंत्री ने सी.आई.डी. की रिपोर्ट पर कार्रवाई करते हुए किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करके निवारक अभिरक्षा में रखा है। इस मामले में प्रश्न उठता है कि क्या सी.आई.डी. की रिपोर्ट वास्तविक थी। इस प्रश्न का समाधान बहुत कठिन है।
मुझे यह विचार करना चाहिए था कि कानूनी प्रवीणता से ऐसा कोई तरीका होना