33. भारत के लोग अपने मूल अधिकार पहचानेंगे - Page 116

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चाहिए जो ऐसी रिपोर्टों पर कार्यवाही करने में मंत्री के अधिकारों पर कुछ प्रतिबंध अथवा कुछ सीमाएं लगाता हो, ताकि कार्यकारी कार्रवाई करने के लिए पर्याप्त आधार हो और पेश की गई रिपोर्ट ठोस और वास्तविक हो। यदि ऐसा किया जाता है तो मेरे विचार से उच्चतम न्यायालय का होना एक अन्य रक्षोपाय है।

भारत अभी संक्रमण की स्थिति में है। जब यू.एस.ए. ने अपना संविधान तैयार किया था और उसमें मूल अधिकारों को शामिल किया था, तब वहाँ लोग नहीं जानते थे कि उन अधिकारों का स्वरूप, दायरा और सीमाएँ क्या हैं। उच्चतम न्यायालय के न्यायिक निर्णयों की लम्बी शृंखला के बाद कठिनाइयों का निवारण हुआ और मूल अधिकारों के स्वरूप, दायरे और सीमाओं का निर्धारण किया गया। इसी प्रकार मुझे विश्वास है कि पाँच या दस वर्ष बाद भारत के लोग अपने मूल अधिकार पहचानेंगे और जानेंगे कि संविधान उनके लिए क्या मायने रखता है।

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प्रश्न : भारत में वयस्क मताधिकार एक बार में ही क्यों लागू कर दिया गया; क्रमशः क्यों नहीं?

उत्तर : मेरे विचार से तो सत्तारूढ़ दल वयस्क मताधिकार के सिद्धांत के प्रति इतना प्रतिबद्ध था कि विचार-विमर्श के अंत में उन्हें इसकी उपयोगिता के बारे में संदेह महसूस होने के बावजूद वे इससे मुँह नहीं मोड़ सके।

व्यक्तिगत रूप से, मैं वयस्क मताधिकार से कतई भयभीत नहीं हूँ। मैं उन थोड़े से लोगों में से हूँ जो जनता के निरन्तर सम्पर्क में रहते हैं और मुझे दृढ़ विश्वास है कि वयस्क मताधिकार के बारे में किसी प्रकार की गलतफहमी होने या गलतबयानी किए जाने का कोई डर नहीं है। वयस्क मताधिकार के बारे में केवल एक कठिनाई मैं महसूस करता हूँ और वह है इस देश में मतदाताओं की इतनी विशाल संख्या से मतदान कराने की हमारी कमजोर सरकारी मशीनरी की क्षमता। मेरे विचार से, इस कठिनाई से पार पाने का एक ही तरीका है कि सभी निर्वाचन क्षेत्रों में एक दिन मतदान कराने के बजाए विभिन्न चरणों में यह प्रक्रिया सम्पन्न करना ताकि सरकारी मशीनरी की कार्यक्षमता प्रभावित न हो।

प्रश्न : क्या यह सच है कि हैदराबाद अनुसूचित जाति संघ की कार्यसमिति की बैठक में सवर्ण हिन्दुओं को अल्टिमेटम देने का निर्णय लिया गया था कि यदि वे अनुसूचित जातियों का उत्पीड़न बंद नहीं करते और उनके अधिकारों को मान्यता नहीं देते तो अनुसूचित जातियाँ यह मामला संयुक्त राष्ट्र ले जाएंगी ?