33. भारत के लोग अपने मूल अधिकार पहचानेंगे - Page 117

98 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

उत्तर : इस बैठक का कोई एजेण्डा नहीं था और कोई प्रस्ताव पारित नहीं किया गया था।

बहरहाल, किसी भी देश की जनता का कोई भी तबका यदि उत्पीडि़त महसूस करता है तो उसके लिए मानवाधिकार आयोग जाने का रास्ता खुला है।

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भारत में अस्पृश्यता की समस्या में अब आर्थिक पहलू जुड़ गया है, जबकि पहले ऐसा नहीं था।

मुझे लगता है कि आज अस्पृश्य समझी जाने वाली जातियों की स्थिति पाँच या छह वर्ष पूर्व की स्थिति से कहीं बेहतर है, लेकिन यदि उनके रास्ते में कुछ अड़चनें नहीं होती तो उन्होंने और जल्दी बेहतर तरक्की की होती।

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सभी सम्प्रदायों के लिए सामान्य नागरिक संहिता

प्रश्न : क्या भारत में रहने वाले सभी सम्प्रदायों जैसे हिन्दू, मुस्लिम, इसाई, पारसी आदि के लिए सामान्य नागरिक संहिता होना संभव है?

उत्तर : इस देश में सभी के लिए चाहे उनकी जाति और धर्म कुछ भी हो, एक ऐसी सामान्य नागरिक संहिता जो सब पर लागू हो सके, तैयार करना आसान नहीं है। यह बात भी बिल्कुल स्पष्ट है कि हम भारत से बाहर के किसी देश से न्याय के सिद्धांतों का नए सिरे से आयात नहीं कर सकते। हमारी परिस्थितियां स्वच्छ और अप्रतिबंधित नहीं हैं। हमें हिन्दू कानून, मुस्लिम कानून, इसाईयों को नियंत्रित करने वाला कानून और अन्य अधिनियम लेकर उनमें से एकसमान बातें ढूंढनी चाहिए। कानून में एकरूपता लाने के लिए हमें हर सम्प्रदाय के पास जाकर एकसमान बातों को स्वीकार कर लेने का अनुरोध करने की कोशिश करनी चाहिए।

लेकिन सबसे पहले हमें अपना खुद का कानून जानना चाहिए कि यह है क्या। उदाहरण के लिए, हिन्दू कानून एक “जंगल” है। इसे एक संहिता का रूप दिया जाना चाहिए ताकि सामान्य संहिता पर विचार-विमर्श करने से पहले लोग उन्हें नियंत्रित करने वाले कानूनों के बारे में जानें।

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