100 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
उन्होंने 1929 में जोर देकर कहा था कि भारत स्वतंत्र उपनिवेश के दर्जे से संतुष्ट नहीं होगा। जब 1942 में “भारत छोड़ो आन्दोलन” शुरू हुआ तब वही थे जिन्होंने भारत छोड़ो आन्दोलन का विरोध किया। उनकी यह वैचारिक स्थिति लाहौर की वैचारिक स्थिति के विरुद्ध थी। जब मैंने संविधान तैयार किया तो उन्होंने भारत के स्वतंत्र उपनिवेश होने का कड़ा विरोध किया और अचानक वार्ता करने लन्दन चले गए और वापस आकर घोषणा कर दी कि भारत को राष्ट्रमंडल में होना चाहिए।
प्रश्न : लेकिन आपका क्या विचार है कि भारत को अब क्या करना चाहिए?
उत्तर : मैं कुछ नहीं कह सकता। यह बहुत जटिल प्रश्न है। भारत को वही करना चाहिए जो उसके लिए फायदेमंद हो। यदि देश सोचता है कि राष्ट्रमंडल में रहने से कोई लाभ नहीं है तो उसे बाहर निकल जाना चाहिए। मैं यही कहता हूं कि अडिग और ईमानदार बनो।
***