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ताकत बढ़ाए बिना स्वतंत्र विदेश नीति की बातें करने का
“डॉ. अम्बेडकर पत्रकारों को पसंद नहीं करते। शनिवार * को बम्बई में एक
अनौपचारिक चर्चा में उन्हांने यह बात कहीं। जब उन्हें प्रेस के सहयोग की पेशकश
की गई तो इसे उन्होंने ठुकरा दिया।
जो कुछ भी उन्होंने कहा, उसमें से ज्यादातर “ऑफ द रिकार्ड” था।
उन्हांने स्पष्ट किया कि वह महसूस करते हैं कि पं. नेहरू भारत को विनाश के
रास्ते पर ले जा रहे है। उनका सुझाव था कि और लोगों के मामलों में दखल देने
के बजाए हमें अन्य देशों से अलग रहना चाहिए और अपनी चरमराती अर्थव्यवस्था
को उबारना चाहिए। चीन के आक्रमण के खतरे का साया डॉ. अम्बेडकर को पीछा
करता हुआ लग रहा था। उन्होंने कहा कि चीन हमारी दहलीज तक आ पहुंचा है
और हम अपनी सुरक्षा करने की स्थिति में नहीं हैं। ताकत बढ़ाए बिना स्वतंत्र विदेश
नीति की बातें करने का कोई फायदा नहीं है।
डॉ. अम्बेडकर एक उच्च कोटि के विद्वान हैं। कोई उनके विचारों से पूरी
तरह असहमत होते हुए भी उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। वह अपनी
बात बेबाक होकर कहते हैं; वह प्रश्नों के उत्तर तत्परता से देते हैं। चुटकियाँ लेने
में वह सिद्धहस्त हैं।” ख्1,
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* 1 द नेशनल स्टैण्डर्ड, दिनांक 25 नवम्बर, 1951 24 नवम्बर, 1951