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कार्यकारी परिषद में अनुसूचित जातियों के प्रतिनिधित्व के
नई दिल्ली, 7 जून 1945
प्रिय लॉर्ड वावेल,
मैं आपका आभारी हूं कि आपने मुझे अनुसूचित जाति के नेता के रुप में उस
सम्मेलन के लिए सदस्य के रुप में आमंत्रित किया है, जो आपने कार्यकारी परिषद
के भारतीयकरण के प्रस्ताव को आगे बढ़ाने के लिए आयोजित की है। मैंने आपको
बताया था कि कुछ कारणों से, जिनका यहां दोहराया जाना आवश्यक नहीं है,
आपका प्रस्ताव स्वीकार नहीं कर सकता। जिस पर आपने किसी प्रतिस्थापन व्यक्ति
का नाम सुझाने को कहा है। यद्यपि मैं आपके प्रस्तावों के संबंध में अपनी सहमति
व्यक्त कर चुका हूं, फिर मैं ऐसी सहायता के लिए मना नहीं करना चाहता जिससे
सम्मेलन में किसी अनुसूचित जाति के प्रतिनिधि की मौजूदगी से आप कोई परिणाम
निकाल सकें। अतः मैं कोई और नाम सुझाने के लिए तैयार हूं। मेरे ध्यान में आने
वाले विभिन्न नामों की उपयुक्तता के आधार पर, मैं राव बहादुर एन. शिवराज, बी.ए.,
बी.एल.के अलावा किसी और नाम पर विचार नहीं कर सकता। वह अखिल भारतीय
अनुसूचित जाति फेडरेशन के अध्यक्ष हैं और केन्द्रीय विधान सभा तथा राष्ट्रीय रक्षा
परिषद के सदस्य भी हैं। यदि आप चाहें, तो अनुसूचित जाति के एक प्रतिनिधि के
रुप में आप उन्हें सम्मेलन में आमंत्रित कर सकते हैं।
- एक मुद्दा और है, जिस पर मैं समझता हूं कि इस समय आपका ध्यानाकर्षण
जरूरी है। यह कार्यकारी परिषद के पुनर्गठन के लिए हिज मेजेस्टी की सरकार के
प्रस्तावों में अनुसूचित जातियों को दिए गए प्रतिनिधित्व की नितान्त अपर्याप्ता के
संबध में है। 9 करोड़ मुसलमानों को पांच सीटें (स्थान) 5 करोड़ अछूतों को एक
सीट और 60 लाख सिखों को एक सीट आश्चर्यजनक है और अनर्थकारी राजनैतिक
गणित है, जो मेरे न्यायवादी और सहज बुद्धि वाले विचारों से बिल्कुल विपरीत है।
मैं इसका भाग नहीं बन सकता। यदि आवश्यकताओं को देखें तो अछूतों को, यदि
अधिक नहीं तो, मुस्लिमों के बराबर प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। आवश्यकताओं को
छोड़ भी दें तो केवल संख्या के आधार पर अछूतों को कम से कम तीन सीटें मिलनी