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( ii ) मुस्लिम
( iii ) अनुसूचित जाति
( iv ) सिक्ख
( v ) भारतीय ईसाई
( vi ) आंग्ल भारतीय
(ख) कार्यकारी परिषद् में इन समुदायों का प्रतिनिधित्व, जहां तक संभव है विधायिका में उनकी शक्ति का परिचायक है।
मैं बताना चाहूंगा कि कार्यकारी परिषद् में मेरे दो हिंदू साथियों ने आज सुबह आपको दिए गए ज्ञापन में यह व्यक्त किया है कि हिज मेजेस्टी की सरकार के प्रस्तावों में अनुसूचित जातियों को दिया गया प्रतिनिधित्व अपर्याप्त और अनुचित है। मुझे यह जानकर दुख पहुंचा है कि अपनी वृŸा से अनुसूचित जातियों की विश्वासपात्र बनने वाली और अपनी बारंबार की जाने वाली घोषणाओं के विपरीत काम करने वाली हिज मेजेस्टी की सरकार ने अपने आश्रितों के साथ अस्वतांत्रय, अन्यायपूर्ण और अनैतिक तरीके से बर्ताव किया है और जागृत हिंदू वर्ग की राय से भी परे रहकर कार्य किया है। अतः, मैं समझता हूं कि यह मेरा आबद्ध और पवित्र कर्तव्य है कि मुझे सभी साधनों और पूर्ण शक्ति से विरोध करना है। इस प्रस्ताव का आशय अछूतों के लिए मृत्युनाद है और इससे पिछले 50 वर्षों से अपने उद्धार के लिए उनके प्रयासों पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। अनेक घोषणाओं के होते हुए यदि हिज मेजेस्टी की सरकार अछूतों का भाग्य हिंदू-मुस्लिम गठबंधन को हस्तांतरित करना चाहें तो वह निश्चित रुप से कर सकती है। किन्तु मैं अपने लोगों को दबाये जाने के लिए इसका हिस्सा नहीं बन सकता। मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि हिज मेजेस्टी की सरकार अपनी गलती को सुधारे और नई कार्यकारी परिषद् में अछूतों को कम से कम 9 सीटें दें। यदि हिज मेजेस्टी की सरकार इसके लिए तैयार नहीं है तो उसे यह जान लेना चाहिए कि यदि मुझे स्थान दिए जाने का प्रस्ताव भी मिला होता तो भी मैं नव-गठित कार्यकारी परिषद का सदस्य नहीं बनता। काफी समय से अछूत वर्ग अपने राजनैतिक अधिकारों को पूर्ण मान्यता प्रदान किए जाने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। मुझे कोई संदेह नहीं है कि हिज मेजेस्टी की सरकार के निर्णय से वे हतप्रभ रह जाएंगे और मुझे आश्चर्य नहीं होगा यदि समस्त अनुसूचित जातियां विरोध प्रकट करने के लिए नई सरकार के साथ कोई भी सहयोग न करें। मुझे विश्वास है कि उनका मोह भंग होने से रास्ते अलग-अलग हो जाएंगे। मेरा अनुमान हैं कि हिज