42. कार्यकारी परिषद में अनुसूचित जातियों के प्रतिनिधित्व के लिए प्रस्ताव - Page 137

118 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

मेजेस्टी की सरकार के प्रस्तावों का, यदि उन्हें संशोधित न किया गया तो, यही परिणाम होगा। जहां तक मेरा स्वयं का संबंध है, मैं निर्णय ले चुका हूं। मुझे बताया जा सकता है कि यह कार्रवाई की अंतिम रुपरेखा नहीं है। यह केवल एक अंतरिम व्यवस्था है। मैं काफी लंबे समय से राजनीति में हूं और यह जानता हूं कि रियायतें और समायोजन जितने अधिक (एक बार) किए जाते हैं, वे निहित अधिकार बन जाते हैं और एक बार गलत समझौतों पर सहमति हो जाने पर वे भविष्य में होने वाले समझौतों के लिए उदाहरण बन जाते हैं। अतः मैं यह अन्याय होते नहीं देख सकता। यदि मुझमें सही निर्णय लेने की क्षमता है, तो मैं यह देख रहा हूं कि सीटों का यह वितरण, हालांकि एक अस्थायी व्यवस्था के तौर पर आरंभ हुआ है, स्थायी होने के साथ अपने अंत पर पहुंचेगा। अंतिम समय आने पर पछताने के बजाए मैं आरंभ से ही इसके विरुद्ध अपना विरोध दर्ज करता हूं।

ऐसा हो सकता है कि हिज मेजेस्टी की सरकार द्वारा मुझे और यहां तक कि भावी भारत सरकार में अनुसूचित जातियों के प्रतिनिधित्व को अनदेखा किया जाएः न ही इस देश में हिज मेजेस्टी की सरकार और अनुसूचित जातियों के बीच पैदा होने वाली दरारों से उपजने वाले परिणामों पर कोई खेद प्रकट किया जाए, परन्तु मुझे विश्वास है कि उचित केवल यही है कि हिज मेजेस्टी की सरकार यह जान ले कि मैं इस विषय पर क्या कहना चाहता हूं। अतः मेरा अनुरोध है कि आप कार्यकारी परिषद में अनुसूचित जातियों के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने के मेरे प्रस्ताव और यदि यह प्रस्ताव निरस्त कर दिया जाता है, तो मेरी प्रस्तावित कार्रवाई की जानकारी हिज मेजेस्टी की सरकार तक पहुंचा दें।

आपका,

डॉ. भीमराव अम्बेडकर