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केबिनेट मिशन को प्रस्तुत ज्ञापन
‘‘अंग्रेज जानते थे कि उनके लिए भारत को बंधनों में जकड़े रखना अधिक समय तक संभव नहीं था। अतः 15 मार्च, 1946 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली ने ब्रिटिश राष्ट्रमंडल के अंतर्गत अथवा उसके बिना भी भारत के पूर्ण स्वतंत्रता के अधिकार को माना और कहा कि वे किसी अल्पसंख्यक को बहुसंख्यकों की प्रगति की कीमत पर अपनी वीटो का इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं देंगे।
ब्रिटिश प्रधान मंत्री ने अपने तीन केबिनेट मंत्रियों का एक प्रतिनिधि मंडल भेजा, जिसमें सर स्टेफॉर्ड क्रिप्स, ए.वी. अलेक्जेंडर और तत्कालीन सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फॉर इंडिया लार्ड पैथिक लॉरेंस शामिल थे। इन्हें राजनीतिक गतिरोध समाप्त करने के लिए भारतीय दलों के नेताओं से ऑन द स्पॉट वार्ता करनी थी। ब्रिटिश केबिनेट प्रतिनिधि मंडल 24 मार्च, 1946 को भारत पहुंचा, जहां वाइसरीगल लॉज में अनेक साक्षात्कार, उच्च स्तरीय वार्ताएं और संवेदनशील विचार-विमर्श हुए।
उस माहौल के बीच मिशन द्वारा 5 अप्रैल, 1946 को अल्पसंख्यक समुदायों के दो प्रतिनिधियों का साक्षात्कार किया गया। वे दो थे डॉ. भीमराव अम्बेडकर और मास्टर तारा सिंह। डॉ. अम्बेडकर ने कमीशन के समक्ष एक ज्ञापन प्रस्तुत किया..... .’’। ज्ञापन का विवरण इस प्रकार हैः-
अखिल भारतीय
अनुसूचित जाति संघ
5 अप्रैल, 1946 को
डॉ. भीमराव अम्बेडकर द्वारा
केबिनेट मिशन के समक्ष प्रस्तुत
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अखिल भारतीय अनुसूचित जाति संघ की कार्य-समिति द्वारा 2 अप्रैल, 1946 को दिल्ली में आयोजित बैठक में पारित संकल्प।