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- यदि अनुसूचित जातियां प्रान्तीय विधान मंडलों में अपना एक भी ऐसा प्रतिनिधि
नहीं भेज पातीं, जो अनुसूचित जातियों के मतों से चुना जाए और इस कारण
उसे अनुसूचित जातियों का सच्चा प्रतिनिधि कहा जाता हो तो ऐसा संयुक्त
निर्वाचन क्षेत्रों के कारण है, जहां अनुसूचित जातियों के लिए सींटें आरक्षित
की गई हैं, वहां अनुसूचित जातियों और सवर्ण हिन्दुओं के बीच मतदाताओं
की संख्या में बहुत अधिक विषमता के चलते अनुसूचित जातियों की दृष्टि में
वह स्थान रॉटेन-बॉरो और सवर्ण हिन्दुओं की दृष्टि में पाकेट-बॉरो बन चुका
है, जो अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों को खड़ा करने में सक्षम हो चुके हैं,
उन्हें अपने हाथों की कठपुतली बनाना चाहते हैं और संयुक्त निर्वाचन क्षेत्रों में
विशेष रूप से सवर्ण हिन्दुओं के मतों के द्वारा उन्हें निर्वाचित करते हैं।
- संयुक्त निर्वाचन क्षेत्रों की प्रणाली जो पहले अनुसूचित जातियों के मामले में
होती थी, के संबंध में कड़वे अनुभव को देखते हुए, कार्य समिति मिशन को
अनुसूचित जातियों के इस सुदृढ़ विश्वास के बारे में बताना चाहती है कि अलग
निर्वाचन क्षेत्रों की बहाली परम आवश्यक हो चुकी है, क्योंकि उनका विश्वास
है और यही सत्य भी है कि अलग निर्वाचन क्षेत्रों का स्वरूप ही अनुसूचित
जातियों के संवैधानिक रक्षोपायों के लिए सवर्ण हिन्दुओं के वर्चस्व के विरुद्ध
गारंटी है और यह कि अलग निर्वाचन क्षेत्रों के बिना अनुसूचित जातियां किसी
भी राजनैतिक रक्षोपाय का लाभ नहीं उठा सकेंगी।
- विधान मंडल कार्य पालिका और सेवाओं में अनुसूचित जातियों के पर्याप्त
प्रतिनिधित्व के उपबंध के प्रश्न पर, कार्य-समिति सीधे तौर पर अनुसूचित
जातियों को प्रायः सांकेतिक प्रतिनिधित्व दिए जाने के प्रस्ताव का विरोध करती
है और अन्य अल्पसंख्यक जातियों को लाभ दिए जाने का कड़ा विरोध व्यक्त
करती है, जो अनुसूचित जातियों का उचित अंश छीन तो नहीं सकतीं, किन्तु
उससे वंचित तो कर सकती हैं। कार्य-समिति इस तथ्य पर जोर देना चाहती
है कि अनुसूचित जातियां भारत के राष्ट्रीय जीवन में एक तीसरा महत्वपूर्ण अंश
हैं और यह कि वे तब तक संतुष्ट नहीं होंगे, जब तक उनकी आवश्यकताओं
और संख्या के अनुरुप उन्हें पर्याप्त प्रतिनिधित्व न दे दिया जाए।
कार्य-समिति को प्रसन्नता होगी यदि वह मिशन को अनुसूचित जातियों के उस
खौफ से अवगत करा सके, जो उन्हें पुलिस और राजस्व सेवाओं के कर्मचारियों से है, क्योंकि वहां पूरी तरह सवर्ण हिन्दुओं का वर्चस्व है, जो ब्रिटिश सरकार के अधीन कार्यरत रह कर भी अनुसूचित जातियों को सता, दबा रहे हैं और उनसे भेदभाव करते हैं, साथ ही वे हिन्दुओं की बहुलता वाले विधान मंडल और कार्यपालिका से अपनी