45. डॉ. भीमराव अम्बडेकर और फील्ड मार्शल विस्काउंट वॉवेल के बीच बैठक पर टिप्पणी - Page 156

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श्री अश्कीथ ने सुझाया था कि उल्सटर को शेष आयरलैण्ड से छह वर्ष के लिए अलग कर दिया जाए किन्तु इस अवधि के दौरान सामान्य हितों के मामलों का निबटाने के लिए देश के दोनों भागों के प्रतिनिधियों वाली एक परिषद गठित कर दी जाए। छठे वर्ष की समाप्ति के बाद उल्सटर को यह चुनना होगा कि क्या वह अलग रहना चाहेगा अथवा फिर से दक्षिण आयरलैण्ड के साथ मिल जाना चाहेगा। इसी प्रकार, डॉ.अम्बेडकर का प्रस्ताव था कि पाकिस्तान को दस वर्ष के लिए स्वतंत्रता दी जानी चाहिए, इस अवधि के बाद यह पता चल जाएगा कि क्या यह एक स्वस्थ प्रतिपादना थी। उन्होंने स्वीकार किया कि यदि उस समय पाकिस्तान के लोग हिन्दुस्तान में मिलना चाहेंगे तो वे बातचीत के लिए कमजोर स्थिति में होंगे और समस्त मजबूत पक्ष दूसरी ओर होगा। दस वर्ष की इस अवधि में एक सामान्य परिषद बनाई जा सकती है, किन्तु यह पूर्णतया परामर्शी होगी और इसे कोई कार्यपालक शक्तियां प्राप्त नहीं होगी। ऐसी कोई भी अखिल भारतीय केन्द्र सरकार, जिसे अपनी वर्तमान मनःस्थिति के चलते मुस्लिम लाने को सहमत हों, इतनी कमजोर होगी कि वह अनुपयोगी सिद्ध होगी। पाकिस्तान के लिए मुस्लिम मांग के अलावा अनेक अन्य प्रवृŸायां काम कर रही थीं, और केवल एक शक्तिशाली केन्द्रीय सरकार देश को एक साथ संभाल सकती थी।

संविधान सभा में अनुसूचित जातियों के प्रतिनिधित्व के तरीके पर पूछताछ के उŸार में, डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि वे बिल्कुल नहीं चाहते कि संविधान सभा का गठन हो। इसमें सवर्ण हिन्दों का वर्चस्व रहेगा और अनुसूचित जाति के सदस्य केवल अल्पसंख्यक होकर रह जाएंगे और सदैव मतों के आधार पर हारेंगे, चाहे सभा के निर्णयों के लिए तीन-चौथाई अथवा दो-तिहाई बहुमत की ही आवश्यकता हो। हिज मेजेस्टी की सरकार ने अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए जो आश्वासन दिए थे, उन्हें बोर्ड द्वारा अनदेखा किया जाएगा। इसके अतिरिक्त, सभा के सदस्यों में इतना भ्रष्टाचार व्याप्त होगा कि वे अपने समुदायों के हितों के विरुद्ध मतदान करने लगेंगे।

उनका अपना यह प्रस्ताव था कि संविधान सभा के लिए निर्धारित कार्य दो श्रेणियों में बांट दिए जाएं, अर्थात्-

(क) समुचित रूप से संवैधानिक प्रश्न कहे जाने वाले यथा विधायिका और कार्य पालिका के बीच संबंध और उनका गठन तथा संबंधित कार्य। इन मामलों पर कोई ऐसा बड़ा विवाद नहीं था, जिसने कोई भावनाएं उत्पन्न नहीं कीं। उनके साथ काम करना उस व्यक्ति की बौद्धिक क्षमता से परे की बात थी, जिन्हें भेजने की प्रान्तीय सभाएं उम्मीद करती थी, और यह एक विशेषज्ञता वाला काम था।