45. डॉ. भीमराव अम्बडेकर और फील्ड मार्शल विस्काउंट वॉवेल के बीच बैठक पर टिप्पणी - Page 157

138 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

(ख) सांप्रदायिक विवाद

प्रश्न शीर्षक के अंतर्गत प्रश्न आयोग को निर्दिष्ट किए जाने चाहिए जिसकी अध्यक्षता ग्रेट ब्रिटेन अथवा अमेरिका के किसी प्रतिक संवैधानिक अधिवक्ता द्वारा की जाए। अन्य सदस्यों में दो भारतीय विशेषज्ञ होने चाहिए और हिंदू तथा मुस्लिम समुदायों से एक-एक प्रतिनिधि होना चाहिए। भारत शासन अधिनियम, 1935 विचारणीय विषय होना चाहिए और आयोग क्या-क्या बदलाव किए जाए।

मद (ख) के अंतर्गत प्रश्न विभिन्न समुदायों के नेताओं वाले सम्मेलन को निर्दिष्ट की जाएं। यदि सम्मेलन किसी सहमत हल पर नहीं पहुंच सके, तो हिज मेजेस्टी की सरकार को अधि निर्णय देना होगा। यदि अधिनिर्णय युक्तियुक्त हों, तो इन्हें निसंदेह स्वीकार किया जाएगा।

डॉ. अम्बेडकर ने तब जाकर अनुसूचित जातियों की वर्तमान स्थिति का उल्लेख किया। यह अनुमान लगाया गया कि उनकी संख्या 6 करोड़ थी, यद्यपि यह संख्या संभवतः सही नहीं थी, क्योंकि सर्वप्रथम तो देश में कोई विश्वसनीय आंकड़े उपलब्ध नहीं थे, दूसरे जनगणना के कार्य को राजनीति के साथ मिला दिया गया। ये सभी व्यक्ति गंभीर अक्षमताओं के शिकार थे। गांवों में वे भूमिहीन थे और वास्तव में वहां वे सवर्ण हिन्दूओं के गुलाम थे। हिंदू शक्ति के उदाहरण के रुप में, उन्होंने बताया कि जब कुछ अछूत सेना प्राधिकारियों के अधीन अच्छा वेतन मिलने पर काम के लिए अपने गांवों से भाग लिए, तो सवर्ण हिन्दुओं के लोगों ने उन्हें जबरदस्ती वापस लाकर अपने कामों में लगा दिया। अधीनस्थ पुलिस और राजस्व सेवाओं में सवर्ण हिंदुओं के प्रभुत्व को देखते हुए, अछूतों की दृष्टि में सरकार भी ब्रिटिश नहीं बल्कि हिंदू थी। इसका एक हालिया उदाहरण बम्बई में गांधी जी पर पत्थर फेंके जाने पर उनके 100 लड़कों को गिरफ्तार किया जाना था, जबकि पुलिस ने भी अवसर पाकर शहर के अनुसूचित जाति वाले क्षेत्रों में पर्याप्त नुकसान किया था।

राजनीतिक तौर पर, यद्यपि अन्य जातियों के समान अनुसूचित जातियों को 1932 में अलग निर्वाचन क्षेत्रों का अधिकार दे दिया गया था, वस्तुतः उन्हें पूना समझौते के कारण उससे वंचित रखा गया था। इसकी बजाय उनके लिए दोहरी निर्वाचन प्रणाली लागू कर दी गई, जिसका अर्थ था कि दूसरे निर्वाचन में, जिसमें सभी हिंदू वोट डालते, सवर्ण हिंदू पहले चुनाव के परिणाम को जिसमें केवल अछूत ही मतदाता थे नाकारा बना सकते थे। उन्होंने कार्य-समिति के 2 अप्रैल के संकल्प में जोड़े गए आंकड़ों का हवाला दिया, जिसमें सबसे पहले यह दिखाया गया है कि कई मामलों में कांग्रेस के अनुसूचित जाति के उम्मीदवार, यद्यपि प्रारंभिक चुनावों में फेडरेशन के