47. केबिनेट मिशन के प्रस्तावों के विरुद्ध विरोध पत्र - Page 162

143

6

d sf c u sV f e 'k u d s i zLr ko ksa d s f o #) f o jksèk i =

भीमराव अम्बेडकर

एम.पी.एच.डी., डी.एस.सी.

बेरिस्टर-एट-लॉ,

सदस्य, गवर्नर कार्यकारी परिषद।

22, पृथ्वी राज रोड,

नई दिल्ली

दिनांक 3 मई, 1946

प्रिय लार्ड वॉवेल,

केबिनेट मिशन की आरे से शिमला में आयोजित अपने सम्मेलन में अनुसूचित जाति के प्रतिनिधि को आमंत्रित नहीं किए जाने की भूल ने अनुसूचित जातियों के मस्तिष्क में ऐसी अनेक शंकाएं पैदा कर दी हैं कि उनकी संवैधानिक सुरक्षा की मांग के निपटान के लिए केबिनेट मिशन कैसे प्रस्ताव प्रस्तुत करती है। चूंकि स्थिति संवेदनशील है, मैं इस संबंध में आपको अनुसूचित जाति की प्रतिक्रियाओं से अवगत करना चाहता हूं।

शिमला सम्मेलन में अनुसूचित जाति के प्रतिनिधि को आमंत्रित नहीं करने की भूल के लिए अनेक स्पष्टीकरण दिए जा सकते हैं। मेरी दृष्टि में एक सुखद स्पष्टीकरण यह प्रतीत होता है कि अनुसूचित जातियों की मांगें ऐसी हैं कि उन्हें अन्य दलों की सहमति की आवश्यकता नहीं है, जब तक कि वे उनके न्यायिक अधिकारों पर कोई हमला न कर दें। यह वस्तुतः उनकी कम से कम तीन मांगों के संबंध में है, अर्थात् (1) पृथक निर्वाचन क्षेत्र, (2) केद्रीय कार्य पालिका में समुचित प्रतिनिधित्व, और (3) भविष्य के संविधान में अनुसूचित जातियों के हितों के रक्षोपायों के संबंध में कुछ सामान्य सिद्धांत स्वीकार करने के लिए दलों से एक अंतरिम सरकार के लिए पूर्व शर्त के रूप में वचन बद्धता।

यह कि अनुसूचित जातियों की मांगों के लिए अन्य दलों की सहमति का अपेक्षित न होना एक ऐसा विचार है जिसे मैंने मिशन के समक्ष अपने 5 अप्रैल, 1946 को दिए गए साक्षात्कार में बड़े सशक्त ढंग से रखा था।