47. केबिनेट मिशन के प्रस्तावों के विरुद्ध विरोध पत्र - Page 163

144 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

एक बहुसंख्यक समुदाय द्वारा अलग निर्वाचन क्षेत्रों की मांग, जैसा पंजाब, उŸार पश्चिम सीमांत प्रांत, सिंध और बंगाल में मुस्लिमों के मामले में है की तुलना में एक अल्पसंख्यक समुदाय जैसे अनुसूचित जाति, द्वारा अलग निर्वाचन क्षेत्रों की मांग का आधार है। एक बहुसंख्यक समुदाय द्वारा अलग निर्वाचन क्षेत्रों की मांग के लिए अल्पसंख्यक समुदाय की सहमति आवश्यक होती है। किन्तु किसी अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा अलग निर्वाचन क्षेत्रों की मांग बहुसंख्यक समुदाय की इच्छा पर निर्भर नहीं हो सकती। निर्वाचन क्षेत्र प्रमुख रूप से अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यकों से सुरक्षा प्रदान करने के लिए बनाया गया एक तंत्र है। अतः निर्वाचन क्षेत्र संयुक्त हो या पृथक पूर्णतः अल्पसंख्यकों पर छोड़ देना चाहिए, ताकि अल्पसंख्यक यह जान सकें कि उनके हित के लिए क्या अच्छा है। बहुसंख्यक इस मामले में कुछ नहीं कह सकते और उन्हें वास्तव में अल्पसंख्यकों का निर्णय स्वीकार करना चाहिए। इसके अनुपालन में, हिन्दुओं के पास कहने को कुछ अधिक नहीं है कि क्या अनुसूचित जातियों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र होने चाहिए अथवा नहीं।

अलग निर्वाचन क्षेत्रों की अनुसूचित जातियों की मांग किसी अन्य समुदाय पर विपरीत प्रभाव नहीं डालती, यहां तक कि हिन्दुओं पर भी नहीं इसीलिए यह मांग अन्य सभी समुदायों को स्वीकार्य है। हिन्दुओं की यह राय की अनुसूचित जातियां हिंदू हैं और इसलिए उन्हें अलग निर्वाचन क्षेत्र नहीं मिलने चाहिए, साधारणतया धर्मवादी सोच है और यह आवश्यक मुद्दा नहीं है कि पृथक निर्वाचन क्षेत्र अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए वस्तुतः एक तंत्र है और इसका धर्म से कोई लेना-देना नहीं है। यदि इसके किसी साक्ष्य की आवश्यकता है तो यूरोपीय, एंग्लो-इंडियन और इंडियन क्रिश्चियन के मामले देखे जा सकते हैं, जो सभी धर्म के मामले में तो एक हैं, किन्तु उनके निर्वाचन क्षेत्र अलग-अलग हैं।

यदि केबिनेट मिशन इन तथ्यों तथा तर्कों पर विचार करे तो इसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं होगा कि अनुसूचित जातियों की यह राय स्वीकार कर ली जाए कि हिन्दुओं की सहमति आवश्यक नहीं है, और इस मामले में पूरी तरह केबिनेट मिशन को निर्णय करना है, विशेषकर तब, जबकि यह सिद्ध हो चुका है कि संयुक्त निर्वाचन क्षेत्रों ने अनुसूचित जातियों की मांग को मज़ाक बना दिया है।

अनुसूचित जातियों की दूसरी मांग कि अंतरिम सरकार में उनका प्रतिनिधित्व मुस्लिमों को दिए गए प्रतिनिधित्व के 50 प्रतिशत के बराबर किया जाना चाहिए, एक ऐसी मांग है जिसे लागू करने से पूर्व हिन्दुओं की सहमति लेना आवश्यक नहीं है। अनुसूचित जातियों की संख्या और उनकी अक्षमताओं को देखते हुए और स्वयं को