48. केबिनेट मिशन के प्रस्तावों के संबंध में ए.वी.अलेक्जेंडर को पत्र - Page 169

150 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

में कोई कठिनाई नहीं होगी कि अछूत पृथक निर्वाचन क्षेत्र क्यों चाहते हैं। विधायिका में अछूत अल्पसंख्यक हो जाएंगे। अल्पसंख्यक रहना उनके भाग्य में है। वह उस बहुसंख्यक होने के कारण, कहा जाए तो, निर्धारित और पूर्व-नियत है। वे मात्र यह कर सकते हैं कि स्वयं को ऐसी स्थिति में रखें कि वे अपनी इच्छानुसार, बहुसंख्यकों द्वारा अपने काम करने की शर्तें तय करवा सके और बहुसंख्यकों द्वारा निर्धारित शर्तों को स्वीकार करने को बाध्य न हों तथा दूसरे, यदि बहुसंख्यक उनके साथ काम करने को राजी नहीं होते और उनकी गलतियों का निपटान करने की मनाही करते हैं, तो कम से कम वे विधायिका में बहुसंख्यकों के विरुद्ध अपना विरोध दर्ज करने के लिए तो स्वतंत्रता बनाए रख सकते है। ऐसा तभी हो सकता है जब विधायिका में उनका प्रतिनिधित्व अपने चुनाव के लिए बहुसंख्यकों को मतों पर निर्भर न हो। यही पृथक चुनाव क्षेत्रों की मांग के लिए उनका आधार है।

  1. जब तक अछूतों को एक अलग निर्वाचन क्षेत्र नहीं मिलता अछूतों को मिले रक्षोपायों का उनके लिए कोई मूल्य नहीं रहेगा। पृथक निर्वाचन क्षेत्र इस मामले में एक प्रमख विषय है। केबिनेट मिशन ने 9 अप्रैल, 1946 को जिन तीन कांग्रेसी हरिजनों का साक्षात्कार लिया था, मेरे सामने उनके द्वारा केबिनेट मिशन को प्रस्तुत प्रतिवेदन की एक प्रति रखी हुई है। वे टूली स्ट्रीट के तीन टेलर्स से अधिक कुछ नहीं थे, जिन्होंने पालियामेंट को संबोधित करते हुए ‘हम इग्लैण्ड के लोग’ कहने की साहसिकता की थी। इसके अलावा, यह ध्यान देने योग्य है कि अनुसूचित जाति संघ की ओर से मेरे द्वारा उठाई गई मांगों और इन कांग्रेसी हरिजनों द्वारा उठाई गई मांगों में कोई अंतर नहीं हैं। केवल एक अंतर जो सामने आता है, वह पृथक निर्वाचन क्षेत्रों का प्रश्न है। मैं नहीं जानता कि आप कांग्रेसी हरिजनों की मांगों का क्या मतलब लगाते हैं। वास्तव में वे मांगें नहीं है। वे मात्र उसी का प्रतिनिधित्व हैं जो राजनैतिक रक्षोपायों के तौर पर अछूतों का देने के लिए कांग्रेस ने तैयार की हैं। यह केवल मेरी सोच नहीं है। यह मेरा ज्ञान है। इस संबंध में मुझे ऐसे व्यक्ति द्वारा जानकारी दी गई, जो कांगेस की विचारधारा को जानता है कि यदि मैं संयुक्त निर्वाचन क्षेत्र स्वीकार करने को तैयार होता तो कांग्रेस अपनी ओर से मेरी अन्य समस्त मांगों को स्वीकार करने के लिए बिल्कुल तैयार रहती। आप आश्चर्यचकित होंगे कि कांग्रेस अनुसूचित जातियों की समस्त मांगों को स्वीकार करने को तैयार होती और केवल एक मांग अर्थात् पृथक निर्वाचन क्षेत्र का विरोध करती। यदि आप सोचें तो कोई आश्चर्य नहीं होगा कि कांग्रेस क्या खेल, खेल रही है। यह बहुत गहरा खेल है। यह महसूस करके कि अछूतों को कुछ रक्षोपाय प्रदान करने से नहीं बचा जा सकता, कांग्रेस ऐसा कोई मार्ग खोजना चाहती है, जिससे वह अछूतों का निष्प्रभावी बना सके। इसी कारण कांग्रेस संयुक्त निर्वाचन क्षेत्रों पर जोर दे रही है। संयुक्त निर्वाचन क्षेत्रों का अभिप्राय है अछूतों को बिना शक्ति के कुर्सी प्रदान करना। अछूत