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चाहते हैं कुर्सी के साथ-साथ उन्हें शक्ति भी मिले। ऐसा, वह पृथक निर्वाचन क्षेत्रों के माध्यम से प्राप्त कर सकते हैं और इसी कारण वे इस पर जोर दे रहे हैं।
मेरा विश्वास है कि अनुसूचित जातियों के पक्ष में पृथक निर्वाचन क्षेत्रों का मामला कच्चे लोहे के समान है। कांग्रेस के अलावा अन्य सभी दल इसे स्वीकार करते हैं। मैंने पृथक निर्वाचन क्षेत्रों के बारे में अपने विचार लॉर्ड वॉवेल को 3 मई, 1946 को लिखे अपने पत्र में रखे, जो उन्होंने आपको अवश्य दिखाए होंगे अतः उन्हें यहां दोहराना अनावश्यक होगा। प्रश्न यह है कि अनुसूचित जातियों की मांग को लेकर मिशन क्या करने जा रहा है। क्या वे अछूतों को हिन्दुओं की राजनैतिक दासता से मुक्त करने वाले बहुसंख्यक हिन्दुओं से मित्रता करने के क्रम में संयुक्त निर्वाचन क्षेत्रों की व्यवस्था का पक्ष लेकर अनुसूचित जातियों को भेडि़यों को सौंपने जा रहे हैं? अनुसूचित जाति को हिज मेजेस्टी की सरकार से यह पूछने का हक है कि अग्रेजों के जाने से पहले, सरकार हिज मेजेस्टी की यह सुनिश्चित करे कि स्वराज अछूतों के लिए गले का फंदा नहीं बने।
मैं यह कहने की अनुमति चाहूंगा कि अनुसूचित जातियों के प्रति अंग्रेजों की एक नैतिक जिम्मेवारी है। समस्त अल्पसंख्यकों के लिए भी उनकी नैतिक जिम्मेदारी बनती है। किंतु वे अछूतों के प्रति अपनी जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ सकते। यह दुखद है कि केवल कुछ अंग्रेजों को इसकी जानकारी है और कुछ ही इसका निर्वाह करने को तैयार हैं। अछूतों ने आरंभ से ही भारत में ब्रिटिश राज को सहायता प्रदान की है। अनेक अंग्रेज समझते हैं कि क्लाइव, हेस्टिंग्स, कूट्स आदि ने भारत को जीता था। इससे बड़ी कोई भूल नहीं हो सकती। भारत को भारतीयों की एक सेना ने जीता था और जिन भारतीयों से मिलकर वह सेना बनी थी, वे सभी अछूत थे। यदि अछूतों ने भारत की फतह में अंग्रेजों की सहायता नहीं की होती तो भारत में ब्रिटिश शासन संभव ही नहीं होता। प्लासी की लड़ाई का उदाहरण लें, जहां से ब्रिटिश शासन की नींव पड़ी या किरकी के युद्ध का उदाहरण लें जहां से भारत की फतह का काम पूरा हुआ। इन दोनों भाग्य-निर्णायक युद्धों में अंग्रेजों की ओर से लड़ने वाले समस्त सैनिक अछूत ही थे।
अंग्रेजों ने उन अछूतों के साथ क्या किया, जो कि उनकी ओर से लड़े यह एक शर्मनाक कहानी है। सर्वप्रथम, उन्होंने सेना में अछूतों की भर्ती बंद कर दी। इससे अधिक कठोर, अधिक अनुदारता, अधिक क्रूर कार्य इतिहास में मुश्किल से ही पाया जा सकता है। अछूतों को सेना से निकालते हुए अंग्रेजों ने यह ध्यान नहीं दिया कि उन्होंने ही ब्रिटिश शासन की स्थापना में सहायता की थी और 1857 में सहयोगी बलों के संयुक्त विद्रोह की स्थिति में भी अछूतों ने ही उनका बचाव किया था। यह विचार किए बिना कि अछूतों पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा अंग्रेजों ने कलम के ज़रा