152 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
से इस्तेमाल से ही उन्हें जीवन-यापन के अपने स्रोत से वंचित कर दिया और उन्हें बर्बादी की खाई में धकेल दिया। क्या अंगेजों ने किसी भी तरह से उन्हें सामाजिक अक्षमताओं से उबर पाने में सहायता प्रदान की? पुनः इसका उŸार नकारात्मक ही होगा। अछूतों के लिए विद्यायालय’ कुंए और सार्वजनिक स्थल बंद हो गए। यह देखना अंग्रेजों की जिम्मेदारी थी कि नागरिक होने के नाते सार्वजनिक निधि से चलाए जाने वाले समस्त संस्थानों में उन्हें प्रवेश का हक है। किन्तु अंग्रेजों ने ऐसी कोई दयालुता नहीं दिखाई और इससे भी खराब यह रहा कि उन्होंने कार्रवाई न करने का अपना औचित्य सही ठहराते हुए कहा कि अस्पृश्यता उनका सृजन नहीं है। ऐसा हो सकता है कि अस्पृश्यता अंग्रेजों की देन नहीं थी। किन्तु आज की सरकार होने के नाते, यह उनकी जिम्मेदारी थी कि वह अस्पृश्यता को समाप्त करें। कोई भी सरकार जिसे अपनी गतिविधियों और कर्तव्यों की जानकारी हो, इसे समाप्त कर सकती है। ब्रिटिश सरकार ने क्या किया? उन्होंने हिंदू समाज के किसी भी सुधार से संबंधित कार्य को करने से मना कर दिया। जहां तक समाज सुधार का संबंध था, अछूतों ने स्वयं को ऐसी सरकार के अधीन पाया, जो उस सरकार से भिन्न थी जिसके लिए पूरे समर्पण से उन्होंने कुर्बानियां दी थी, जिए और मरे थे और इसने इतिहास को भुला दिया। राजनीतिक दृष्टि से, परिवर्तन बहुत मामूली था। हिन्दुओं की घृणा पहले की तरह जारी रही। ब्रिटिश आला कमान द्वारा रोक लगाए जाने की बजाए, संतुष्टि की नीति चलती रही। सामाजिक दृष्टि से देखें तो, अंग्रेजों ने जैसी व्यवस्था व्याप्त की उसी को स्वीकार किया और पूरी ईमानदारी से उसे वैसे ही संरक्षित रखा, जैसे एक चीनी दर्जी ने एक पुराने कोट को फैशन का रूप दिया, बड़े गर्व से उसके जैसा एकदम दूसरा कोट तैयार किया, उसे किराये पर चलाया और सिलता रहा और ऐसे ही सिलसिला चलता रहा। और परिणाम क्या हुआ? परिणाम है कि भारत में ब्रिटिश शासन की स्थापना से लेकर 200 वर्ष बीत जाने के बाद भी अछूत, अछूत ही बने हुए हैं, उनकी कमियों को सुधारा नहीं गया है और उनकी प्रगति को प्रत्येक चरण में रोका गया है। वास्तव में, यदि ब्रिटिश शासन ने भारत में कुछ किया है तो वह है शक्तिशाली और अनियंत्रित ब्राहमणवाद, जो अछूतों का चिर-स्थायी शत्रु है और जो उन सभी कुरीतियों का जनक है, जिनसे अछूत सदियों से पीडि़त रहे हैं।
- आप यहां यह घोषणा करने आए हैं कि अंग्रेज भारत को छोड़ने वाले हैं। अछूतों द्वारा यह पूछा जाना गलत न होगा कि प्राधिकार सचा और शक्ति की यह संपिŸा आप किसे सौंप रहे हैं? ब्राहमणवाद के उस प्रधान को, अर्थात् जो अछूतों पर अन्याय करता है और उनका उत्पीड़न करता है। भारत में ब्रिटिश साम्राज्य दूसरे हाथों में सौंपे जाने के लिए अन्य दलों के सदस्यों के अंतकर्ण में पछतावा पैदा करने की आवश्यकता नहीं है। किन्तु ब्रिटिश लेबर पार्टी के बारे में क्या कहेंगे? लेबर पार्टी दावा करती है कि वह दलितों और दबे-कुचलों के पक्ष में है। यदि वह अपनी