162 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट पर विचार-विमर्श हुआ, जिसमें ब्रिटिश केबिनेट मिशन के प्रस्तावों पर अनुसूचित जाति के लोगों की आम प्रतिक्रियाएं थीं। ऐसा माना जाता है, कि रिपोर्ट में समुदाय की ओर से असंतोष व्यक्त किया गया था कि प्रस्तावित संविधान सभा में उन्हें कोई प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया था। कार्य-समिति ने अन्तरिम सरकार के संबंध में ब्रिटिश केबिनेट के प्रस्तावों पर दस महत्वपूर्ण संकल्प पारित किए।
समिति ने मांग रखी कि अनसूचित जातियों को पृथक निर्वाचन क्षेत्रों के माध्यम से विधायिका में प्रतिनिधित्व का अधिकार मिलना चाहिए और संविधान में सरकार की ओर से अनुसूचित जातियों के लिए अलग बस्तियां बनाए जाने की बाध्यता संबंधी उपबंध होना चाहिए।
समिति ने अनुसूचित जातियों को अश्वस्त किया कि ऐसा कोई कारण नहीं है, जिससे आपको घबराना पड़े और हतोत्सोहित होना पड़े। उन्हें अपने संघर्ष में जो कि न्याय और मानवता का संघर्ष है उनके शत्रुओं के तंत्र के होते हुए भी विजय प्राप्त होगी।
कार्य-समिति ने अध्यक्ष को एक कार्रवाई परिषद के गठन के लिए प्राधिकृत किया, जिसे प्रत्यक्ष कार्रवाई की जांच करने और कार्रवाई को सर्वाधिक प्रभावी तरीके से निर्धारित करने तथा इसे आरंभ करने का समय तय करने का कार्य सौंपा गया था।
अनुसूचित जाति संघ के संकल्प की प्रतिलिपियां सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फॉर इंडिया तथा वॉयसराय को नई दिल्ली में और प्रधानमंत्री एटली तथा श्री चर्चिल को लंदन भिजवाई गई।
‘‘उक्त सुरक्षा प्राप्त किए जाने के संबंध में उनकी मांग न माने जाने की स्थिति में समिति ने अध्यक्ष, राव बहादुर एन. शिवराज को कार्रवाई परिषद की स्थापना करने के लिए प्राधिकृत किया ताकि उनकी मांगें मनवाए जाने के लिए प्रत्यक्ष कार्रवाई के सबसे प्रभावी माध्यम’’ के संबंध में निर्णय किया जा सके।
कार्य-समिति की ओर से अनुसूचित जाति संघ के एक प्रवक्ता ने स्पष्ट किया कि समिति ने भावी संविधानिक समझौते पर ध्यान केन्द्रित किया था क्योंकि वे अंतरिम सरकार के गठन की बजाय अनुसूचित जाति के लिए आवश्यक वैधानिक सुरक्षा के प्रति अधिक चिंतित थे। उन्होंने कहा किः ‘‘हालांकि, हम अंतरिम सरकार के गठन के बाद किसी के भी साथ सहयोग के लिए इच्छुक रहेंगे, बशर्तें हमारा सहयोग सम्मानीय शर्तों के साथ मांगा जाता हो’’।