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प्रवक्ता ने बताया कि केबिनेट मिशन ने अपने दूसरे बयान में यह घोषणा करके
ब्रिटिश सरकार की प्रतिष्ठा को आंशिक रूप में बहाल किया है कि इंडो-ब्रिटिश
संधि का निष्कर्ष अल्पसंख्यकों के अधिकारों को पर्याप्त रूप से संरक्षित किए जाने
पर आधारित होगा। तथापि, अनुसूचित जाति संघ की मांग थी कि इसमें उपयुक्त
संशोधन किए गए थे और अब केबिनेट मिशन के प्रस्तावों में इन्हें सुनिश्चित किया
जाना है। उन्हें ऐसा किए जाने में कोई कठिनाई नज़र नहीं आती, जैसा मुस्लिमों
के मामले में किया गया है।
अपने निष्कर्ष में प्रवक्ता ने स्पष्ट किया कि संकल्प में प्रत्यक्ष कार्रवाई की शर्त
तभी काम कर सकेगी, जब संघ अपने लक्ष्य की प्राप्ति में असफल हो जाए। हड़बड़ी
में कार्रवाई करने का कोई आशय नहीं था।
[ जून के प्रथम सप्ताह में बम्बई में आयोजित अखिल भारतीय अनुसूचित जाति
संघ की कार्य-समिति की बैठक में पारित संकल्प का पूर्ण मूल-पाठ निम्नलिखित
है। ]
अखिल भारतीय अनुसूचित जाति संघ की कार्य-समिति ने दो बातों पर विचार
किया (1) भारत के संविधान के संबंध में केबिनेट मिशन द्वारा जारी पहला बयान;
(2) मिशन के सदस्यों द्वारा अपने बयान को विस्तार देने के लिए प्रेस से साक्षात्कार;
(3) केबिनेट मिशन का दूसरा बयान; और (4) केबिनेट मिशन और माननीय डॉ. भीमराव
अम्बेडकर के बीच पत्राचार। केबिनेट मिशन के बयान से कई मुद्दे उठे, जिस पर
कार्य-समिति अपने विचार प्रकट करना चाहती है। इस समय, कार्य-समिति केबिनेट
मिशन की भारत के भावी संविधान के निर्माण के लिए योजना को इस प्रकार लागू
करने को प्राथमिकता देना चाहती है जिससे अनुसूचित जातियां प्रभावित हो सकें।
- कार्य-समिति ने इस पर बहुत रोष जताया है कि केबिनेट मिशन ने अपने
5000 शब्दों के बयान में एक बार भी अनुसूचित जातियों का उल्लेख नहीं किया है।
केबिनेट मिशन की कार्यप्रणाली की मनोस्थिति को समझना कठिन है। यहां तक कि
मिशन को अस्पृश्यता के होने की जानकारी, उनकी अक्षमताओं, पूरे भारत में सवर्ण
हिन्दुओं द्वारा दिन-प्रतिदिन उन पर होने वाले अन्यायों, उत्पीड़न की जानकारी
तक नहीं है। केबिनेट मिशन संभवत ब्रिटिश सरकार की उस घोषणा से अनभिज्ञ
नहीं होगा कि अछूत हिंदू जाति से अलग थे और भारत के राष्ट्रीय जीवन में वे