190 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
के द्वारा निर्णय किया जाना था। अंग्रेजों ने भारत छोड़ने और अपनी शक्तियों को सवर्ण हिन्दुओं और मुस्लिमों को सौंपे जाने का निर्णय ले लिया था। क्या उस समय अनुसूचित जातियां सवर्ण हिन्दुओं से यह पूछने की हकदार नहीं थी कि उन्होंने 6 करोड़ अछूतों की सुरक्षा के लिए क्या प्रस्ताव रखे हैं।
डॉ. अम्बेडकर का दावा था कि बम्बई सरकार और बम्बई विधान सभा कांग्रेस का ही अभिन्न अंग थीं तथा सत्याग्रह का उद्देश्य कांग्रेसी नीति का विरोध करना था।
डॉ. अम्बेडकर ने घोषणा की कि पंजाब और बंगाल जैसे मुस्लिम प्रांतों में सत्याग्रह शुरू करने की उनकी कोई इच्छा नहीं थी क्योंकि ‘‘मुस्लिमों से हमारा कोई झगड़ा नहीं है। उन्होंने हमें आश्वस्त किया है कि हमारे हितों की सुरक्षा की जाएगी।’’
क्रोध में आकर यह अस्वीकार करते हुए कि सत्याग्रह आंदोलन हताशा से प्रेरित था, डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि पिछले चुनाव में अनुसूचित जाति उम्मीदवारों ने शत-प्रतिशत सींटे जीती थीं। हताशा तो तब होती, यदि अनुसूचित जाति के मतदाताओं ने कांग्रेसी हरिजन उम्मीदवारों को चार प्रतिशत मत भी नहीं दिए थे, जो पूरी तरह सवर्ण हिन्दुओं के मतों से जीते थे। वह हारे नहीं थे। यह उनकी विजय थी कि 90 प्रतिशत अनुसूचित जातियां उनके संघ के साथ थीं।
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पूना समझौता, जिसने अनुसूचित जातियों के सच्चे प्रतिनिधियों को विधान सभा में लौटने से रोका, समाप्त होना चाहिए। इसके फलस्वरूप 6 करोड़ अछूत नागरिक अधिकारों से वंचित हो गए थे। यहां तक कि अंतर्राष्ट्रीय कानून के अनुसार इस समझौते की तरह किसी संधि को अंतिम रूप नहीं दिया गया था अथवा वह अनुलंघनीय नहीं बनी थी, जैसा अब पूना समझौता अनुसूचित जातियों के लिए हानिकारक बन चुका था, अतः अनुसूचित जातियां इसके संशोधन के लिए संघर्ष करने की हकदार थीं।
आज सायं बम्बई लौटने से पूर्व, डॉ. अम्बेडकर ने पूना में अनुसूचित जातियों के बहुत बड़ी संख्या में एकत्र लोगों को संबोधित किया, जहां उन्होंने कहा कि संघर्ष जारी रहेगा चाहे उसका अंत कुछ भी हो।
पूना सत्याग्रह के चलते अब तक कम से कम 569 अनुसूचित जाति स्वयंसेवक गिरफ्तार किए गए हैं और उन पर मुकदमा चलाया गया है।