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लंबे बयान में उन्होंने एक बार भी अछूतों का कहीं उल्लेख नहीं किया। केबिनेट मिशन ने किस सीमा तक अछूतों को अनदेखा किया वह निम्नलिखित से स्पष्ट हो जाएगाः-
( i ) जैसा सिक्खों और मुस्लिमों के मामले में किया गया है, अछूतों को केन्द्रीय कार्यकारिणी में अपने प्रतिनिधि नामित करने का अधिकार नहीं दिया गया है। वर्तमान अंतरिम सरकार में उन्हें अनुसूचित जाति के दो प्रतिनिधि मिले हैं, दोनों ही अनुसूचित जातियों के प्रति कोई राजभक्ति अथवा बाध्यता नहीं रखते। इनमें से एक कांग्रेस द्वारा तथा दूसरा प्रतिनिधि मुस्लिम लीग द्वारा नामित किया गया है।
( ii ) अंतरिम सरकार में, अछूतों के प्रतिनिधित्व के लिए कोई कोटा निर्धारित नहीं किया गया है, जबकि मुस्लिमों के मामले में ऐसी व्यवस्था है। 1945 के शिमला सम्मेलन में इस बात पर सहमति हुई थी, कि 14 सदस्यों वाली केबिनेट में अनुसूचित जाति के कम से कम दो सदस्य होने चाहिए। 1945 से 1946 के बीच बदले रुख के कारण ज्ञात नहीं हैं।
( iii ) उन्हें संविधान सभा में पृथक प्रतिनिधित्व का अधिकार नहीं दिया गया है। केबिनेट मिशन का प्रस्ताव हिज मेजेस्टी की सरकार की स्थापित नीति से कैसे अलग हो सकता है?
- केबिनेट मिशन के प्रस्ताव से अछूतों के साथ न केवल बहुत-बुरा बर्ताव हुआ है किन्तु इससे हिज मेजेस्टी की सरकार के सिद्धांत भी गंभीर रूप से विचलित हुए हैं। जिनसे उन्होंने भारतीय राजनीति के संबंध में और अछूतों की स्थिति के संबंध में नीतियां निर्धारित की थीं।
( i ) 1920 से पहले, ब्रिटिश सरकार ने अपने स्वयं के प्राधिकार पर और अपनी इच्छानुसार भारत सरकार में संवैधानिक बदलाव किए थे। ऐसा पहली बार हुआ था, कि 1920 में ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों के परामर्श से भारत का संविधान बनाए जाने का निर्णय लिया। तदनुसार, एक गोलमेज सम्मेलन का आयोजन किया गया, जिसमें भारतीयों को भी आमंत्रित किया गया। भारतीयों में, अछूतों के प्रतिनिधि भी थे, जिन्हें कांग्रेस अथवा अन्य राजनैतिक दलों से अलग और स्वतंत्र रूप से आमंत्रित किया गया था।
( ii ) कांग्रेस के प्रतिनिधि के रूप में, मि. गांधी गोलमेज सम्मेलन में अछूतों को अलग समुदाय के रूप में पहचान दिए जाने का विरोध किया और इस बात पर जोर दिया कि वे हिन्दुओं का ही हिस्सा हैं और इसीलिए वे अलग प्रतिनिधित्व के पात्र नहीं हैं। ब्रिटिश सरकार ने मि. गांधी की बात नहीं मानी थी और अपने अधिनिर्णय