214 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
केवल संख्यात्मक आधार पर बहुसंख्यक न मानकर उनके अस्तित्व को समझा जाए। यही सब उस अन्य महान निकाय पर भी लागू होता है, जिसे अनुसूचित जाति के रूप में जाना जाता है, जो उनकी ओर से गांधी जी के सतत् प्रयासों के बावजूद, यह महसूस करता है कि एक समुदाय के रूप में वे हिन्दू समुदाय, जिनका कांग्रेस द्वारा प्रतिनिधित्व किया जाता है, के मुख्य निकाय से बाहर रहते हैं। ---मा. मि.एल.एस. एमरी, सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फॉर इंडिया
द्वारा 14 अगस्त, 1940 को हाउस ऑफ कॉमन्स में दिए गए भाषण का उदाहरण
( iv ) (
)
‘‘इन समस्त कारणों की विस्तार में पुनरावृŸा किए बिना, मैं आपको याद दिलाना चाहूंगा कि हिज मेजेस्टी की सरकार ने उस समय स्पष्ट किया थाः-
(क) कि, उनकी पूर्ण स्वतंत्रता की प्रस्थापना भारतीय जीवन के मुख्य कारकों द्वारा संविधान तैयार करने और हिज मेजेस्टी की सरकार के साथ आवश्यक संधि व्यवस्थाओं पर बातचीत की सहमति युद्ध के पश्चात ही सर्शत हो गई थी;
(ख) कि, विद्वेष की अवधि के दौरान संविधान में कोई परिवर्तन करना असंभव है, जिसके द्वारा, जैसा आपका सुझाव है, केवल ‘‘राष्ट्रीय सरकार’’ को सेंट्रल असेम्बली को जवाबदेह बनाया जा सके।
इन शर्तों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि जातीय और धार्मिक अल्पसंख्यकों, दलित वर्गों के हितों और भारतीय राज्यों के साथ उनकी संधि की बाध्यताओं की रक्षा का उनका कर्तव्य पूरा होता हो’’।
. ....लार्ड वावेल द्वारा 15 अगस्त, 1944 को मि. गांधी को लिखे .
- केबिनेट मिशन द्वारा अछूतों को पृथक प्रतिनिधित्व नहीं दिए जाने का प्रस्ताव संबंधित तथ्यों के ईमानदारी से किए गए परीक्षण से निकाला गया उनके व्यक्तिगत निर्णय का परिणाम नहीं है। दूसरी ओर मिशन ने जो कुछ किया, वह गांधी जी की पूर्वाधारणाओं के प्रति स्नेह व्यक्त करना है। मि. गांधी अछूतों को भारत के राष्ट्रीय जीवन मे एक अलग पहचान दिए जाने के घोर विरोधी हैं। उन्होंने गोलमेज सम्मेलन में उनके प्रतिनिधित्व का विरोध किया। जब उन्होंने देखा कि उनके विरोध के होते हुए भी अनुसूचित जाति को एक अलग तत्व के रुप में श्री रामसे मॅकडोनाल्ड के सांप्रदायिक अधिनिर्णय द्वारा उन्हें मान्यता प्रदान की गई है तो उन्होंने आमरण