216 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
रहा और यद्यपि इस क्षेत्र ने युद्ध के लिए सहायता तो दी किन्तु अनिच्छा से
कार्य किया। कांग्रेस दल, ब्रिटिश-विरोधी था और युद्ध संबंधी कार्यों में उसका
असहयोग हिन्दू निर्वाचन क्षेत्र की सबसे बड़ी पंसद थी। अन्य दल विशेषकर
अनुसूचित जातियों ने चुनाव में हानि सही क्योंकि वे ब्रिटिश-समर्थक थे और
युद्ध के प्रयासों में उनके सहयोगी थे।
( ii ) चुनाव की तारीख निर्धारित होने से ठीक पहले, वायसराय और कमांडर-इन-चीफ
ने इंडियन नेशनल आर्मी का ट्रायल रख दिया। कांग्रेस ने तुरन्त इंडियन
नेशनल आर्मी के इस प्रयोजन को चुनाव का मुद्दा बना लिया। ट्रायल मुख्य
कारक था, जिसने कांग्रेस का प्रभाव बढ़ाया जबकि वह अभी तक घाटे की
स्थिति में थी।
;( iii ) वह मुद्दा जिस पर चुनाव लड़ा गया, वह स्वतंत्रता और भारत छोड़ो का मुद्दा
था। भारत के भावी संविधान किस तरह का होगा, यह कोई मुद्दा नहीं था।
यदि यह मुद्दा होता तो कांग्रेस को वह बहुमत कभी प्राप्त न होता जो इसने
पाया।
( iv ) केबिनेट मिशन ने रिटर्निंग आफिसर्स और पोलिंग आफिसर्स की खुली शत्रुता
पर ध्यान नहीं दिया-जिनमें सभी सवर्ण हिन्दू थे-और वे कांग्रेस के विरोध
में खड़े होने वाले अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों के विरुद्ध थे। वे उनके
नामांकन पत्र निरस्त करने और मत-पत्र जारी करने के लिए मना करने
की हद तक चले गए थे। केबिनेट मिशन ने आंतकवादी और धमकी देने
जैसी घटनाओं पर ध्यान नहीं दिया, कि सवर्ण हिन्दुओं द्वारा अछूतों को इस
आधार पर डराया-धमकाया जाता था कि वे कांग्रेसी उम्मीदवार को मत देने
को तैयार नहीं थे। आगरा शहर में अछूतों के 40 घर जला दिए गए। बम्बई
में एक अछूत व्यक्ति की हत्या कर दी गई और सैंकड़ो गांवों में असहाय
अछूतों को मतदाता-केंद्रो तक जाने की अनुमति नहीं दी गई। नागपुर में
एक पुलिस अधिकारी इस कदर कांग्रेस का पक्षधर बन गया कि न्यायाधीश
की अनुमति के बिना ही अछूतों को डराने के उद्देश्य से अछूत मतदातों की
भीड़ पर गोली चला दी। पूरे भारत में ऐसे अनेक मामले हुए।
- यदि केबिनेट मिशन ने इन परिस्थितियों पर ध्यान दिया होता, तो उन्हें ज्ञात होता कि चुनावों में कांग्रेस की सफलता पूर्णतया लाभकारी परिस्थितियों का परिणाम थी। इन संपन्न चुनावों के परिणामों को, संविधान सभा में अछूतों को पृथक प्रतिनिधित्व नहीं दिए जाने के औचित्य के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए।