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कराना चाहेंगे। वे चाहेंगे कि उन्हें कार्यकारी परिषद में अपने प्रतिनिधि नामित करने का अधिकार प्राप्त हो। ये अधिकार कोई नए दावे नहीं हैं। ये अछूतों के निहित अधिकार हैं, जिन्हें काफी समय पहले 1945 में शिमला सम्मेलन में मान्यता दी गई थी। वे महसूस करते हैं कि इस गलती को अब सुधारना कठिन हो सकता है। किन्तु यदि परिस्थितियां बदलती हैं और सरकार का पुनर्गठन होता है, तो वे उम्मीद करते हैं कि संसद इस गलती को सुधारने के लिए हिज मेजेस्टी की सरकार पर दबाव डालेगी।
- अछूतों को उस चोट से अब काफी हद तक बचाया जा सकता है, जो उन सवर्ण हिन्दुओं के वर्चस्व वाली संविधान सभा उन्हें दे सकती है, जो अछूतों को उनके राजनैतिक अधिकारों की सुरक्षा से वंचित करना चाहते हैं। इस हानि को रोकने के लिए निम्नलिखित कदम उठाए जा सकते हैः-
I. हिज मेजेस्टी की सरकार पर यह घोषणा करने का दबाव बनाया जाए कि वे एक अल्पसंख्यक वर्ग के रूप में अछूतों का सम्मान करती है।
ऐसा करना कांग्रेस द्वारा अपने 25 जून, 1946 के पत्र (कमी.6861 में मद 21) में लिए गए दृष्टिकोण को देखते हुए आवश्यक है। यह सब इसलिए भी आवश्यक है कि वायसराय ने कांग्रेस को अपने 27 जून, 1946 के उŸार (कमी. 6861 में मद 21) कांग्रेस के इस आशय की विशेष रुप से मनाही से बचना चाहा है कि अछूत अल्पसंख्यक नहीं हैं। यदि इस समय घोषणा करने के लिए सरकार पर दबाव नहीं बनाया जाता है तो अछूत दो तरह से प्रभावित होंगेः-
(क) हिन्दुओं के वर्चस्व वाली संविधान सभा अछूतों को अल्पसंख्यकों के अध्किरों से वंचित करेगी।
(ख) हिज मेजेस्टी की सरकार इस आधार पर उनके बचाव के लिए आगे नहीं आएगी कि उन्होंने अछूतों को एक अल्पसंख्यक वर्ग मानने की प्रतिबद्धता नहीं दिखाई थी।
II. यह घोषणा करवाने के लिए दबाव बनाना कि क्या हिज मेजेस्टी की सरकार एक ऐसा तंत्र, यदि हां तो किस प्रकार का होगा, गठित करेगी जो यह जांच करेगा कि क्या अल्पसंख्यकों के लिए संविधान सभा द्वारा तैयार की गई सुरक्षा व्यवस्थाएं पर्याप्त और वास्तविक हैं।
(क) अपने 25 मई, 1946 (कमो.6835) के अनुपूरक बयान में केबिनेट मिशन ने कहा किः-