66. दलित वर्ग संस्थान - Page 266

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दलित वर्गों के आवेदकों को कभी भी यह बंजर भूमि राजस्व अधिकारियों द्वारा नहीं दी गई जिनके पास जमीन के निपटारे की शक्ति थी। संस्थान अपनी स्थापना के समय से ही खेती करने के लिए इस भूमि के पर्याप्त भाग के लिए दलित वर्गों के अधिकार के लिए लड़ा है और इस भूमि के निपटारे के बारे में सरकार की नीति को, दलित वर्गों पर लागू अनुकूल शर्तों द्वारा आशोधित कराने में सफल हुआ है। अब यह संस्थान का श्रेय कहा जा सकता है कि संस्थान के प्रयत्नों से पर्याप्त संख्या में दलित वर्गों के परिवार जो पहले खेतिहर मजदूर के रूप में अपनी आजीविका कमा रहे थे वे अब स्वतंत्र किसान के स्तर तक उठ गए हैं।

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संस्थान की तीन प्रमुख आवश्यकताएं हैं। पहली आवश्यकता मुद्रण स्थापना का परिवर्धन। संस्थान भारत भूषण प्रिटिंग प्रेस नामक अपना मुद्रणालय चलाता है। अपना मुद्रणालय रखने का प्रयोजन दुगुना है। पहला प्रयोजन है संस्थान द्वारा संचालित जनता समाचार-पत्र और समय-समय पर जारी प्रचार सामग्री का निर्विधन मुद्रण और अन्य अधिक महत्वपूर्ण प्रयोजन प्रिटिंग प्रेस को संस्थान की गतिविधियों को चलाने के लिए आय का स्रोत बनाना था। तथापि प्रिंटिंग प्रेस आय का स्रोत न बनकर संस्थान पर बोझ बन गया। प्रिंटिंग प्रेस में छोटे उपस्कर होने के कारण, संस्थान बाज़ार में विद्यमान प्रतियोगी दरों पर पुस्तक-कार्य या जॉब कार्य लेने में असमर्थ है। क्योंकि छोटी मशीन पर उत्पादन लागत सापेक्षतः अधिक होती है। संस्थान या तो प्रेस के उपस्करों का परिवर्धन करे या बिना प्रेस के काम करे। दूसरा विकल्प भारत की वर्तमान परिस्थितियों में असंभव है क्योंकि अधिकांश मुद्रक सवर्ण हिंदू हैं और इस बात की संभावना हमेशा बनी रहेगी कि वे दलित वर्गों द्वारा चलाए जा रहे समाचार-पत्र को मुद्रित करने में आना-कानी करने की साजिश करें। संस्थान की दूसरी आवश्यकता है बंबई में अपने मुख्यालय के लिए भवन निर्माण की। वर्तमान में संस्थान एक ही भवन में स्थित नहीं है। इसके कार्यालय तितर-बितर है और विभिन्न गतिविधियों के प्रभारी सदस्यों के निजी फ्लैटों में चलाए जा रहे हैं। संस्थान को किराए के कक्षों में चलाने की अपनी कठिनाइयां हैं। इन पर खर्चा करने में भी संस्थान असमर्थ हैं। अस्पृश्यता के कारण फ्लैटों में जगह मिलना कठिन है और रूढि़वादी किराएदारों के विरोध में असमय स्थान खाली करने के दायित्व के कारण संस्थान को अपने लिए उचित स्थान नहीं मिल पाता है। कार्यालय तितर-बितर होने के कारण संस्थान की विभिन्न गतिविधियों में सहयोग और समन्वय में कठिनाई आती है जिसके परिणामस्वरूप संस्थान अप्रभावी हो गया है। संस्थान की तीसरी आवश्यकता है अपने क्रियाकलापों को क्रियान्वित करने के लिए पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं