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मुस्लिम बहुलता वाले प्रांतों में हिन्दू यदि चाहें, तो उन्हें संयुक्त निर्वाचन क्षेत्र मिल जाएंगे। इस प्रस्ताव की मुख्य बात यह है कि निर्वाचन क्षेत्रों का प्रश्न अल्पसंख्यकों के निर्णय पर छोड़ दिया जाए। संयुक्त अथवा अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों की व्यवस्था अल्पसंख्यकों के संरक्षण के लिए की गई है और इन दोनों में से उनका संरक्षण भली प्रकार कौन करेगा, इसका सही फैसला भी अल्पसंख्यक करेंगे।
यदि इस प्रस्ताव में सिद्धांततः कोई दोष है तो इस पर मि. जिन्ना अथवा पं. मदन मोहन मालवीय को विचार करने की कोई आवश्यकता नहीं। परन्तु, यदि यह प्रस्ताव न्यायोचित और निष्पक्ष है, जो मेरे विचार से है, तो मुझे आशा है कि मि. जिन्ना अपने समुदाय के लोगों को इसे बताने का साहस करेंगे और पं. मालवीय अपने विवेक से इसे स्वीकार करेंगे।
मध्यम मार्ग
निःसंदेह यह प्रस्ताव एक बार में ही कांग्रेस और हिंदू महासभा को सभी प्रांतों में हिन्दुओं और मुसलमानों के लिए संयुक्त निर्वाचन क्षेत्र बनाने का उद्देश्य प्राप्त करने में सहायक नहीं होगा। परन्तु, देश भर में संयुक्त निर्वाचन क्षेत्र बनाने की कांग्रेस और हिन्दू महासभा की वैचारिक स्थिति एवं देश भर में अपने लिए अलग निर्वाचन क्षेत्रों की मुसलमानों की मांग को देखते हुए इस प्रस्ताव में एक मध्यमार्ग दिखाने की क्षमता तो है। इस मध्यमार्ग से, कुछ प्रांतों में संयुक्त निर्वाचन क्षेत्रों और शेष प्रांतो में अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों की मिलीजुली व्यवस्था शुरू करते हुए देश भर में संयुक्त निर्वाचन क्षेत्रों के अंतिम चरण तक का सफर आसान हो जाएगा। संयुक्त निर्वाचन क्षेत्रों के समर्थकों में से जो अधीर आदर्शवादी हैं, केवल वही इस प्रस्ताव को खारिज करेंगे। ख्1,
बहरहाल, इस विषय पर डॉ. भीमराव अम्बेडकर के वक्तव्य में जो अतिरिक्त आयाम थे जिनका ब्यौरा “जनता“ में प्रकाशित हुआ था। ये आयाम इस प्रकार थे :-
“निर्वाचन क्षेत्र की संरचना केवल अल्पसंख्यकों का विषय नहीं है। यह संविधान निर्माण से जुड़ी समस्या है, जिसमें पूरे देश की हिस्सेदारी है। एक राष्ट्रीय समस्या को मात्र इससे जुड़े संरक्षण के दावे के कारण केवल इस या उस समूह के निर्णय का विषय नहीं बनाया जा सकता। चूंकि किसी प्रश्न पर मतैक्य असंभव है, अतः राजनैतिक सिद्धांतों की मतभेदों से भरी दुनिया में जन सामान्य की इच्छा के संभव
- द टाइम्पस ऑफ इण्डिया, दिनांक 9 अप्रैल, 1934