10 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
विकल्प के रूप में बहुसंख्यकों के निर्णय को ही अपने कŸार्व्य का निर्वहन करना अपेक्षित है।
अल्पसंख्यकों को महज इसलिए उठाकर बहुसंख्यकों की सत्ता और प्रतिष्ठा से भी ऊंचे शिखर पर बैठा देना, क्योंकि वह अल्पसंख्यक है, लोकतांत्रिक शासन के बुनियादी सिद्धांत की जड़ को ही नष्ट कर देने जैसा है। राजनैतिक विचारधारा नजीर-दर-नजीर आगे बढ़ती है। किसी भी आपत्तिजनक सिद्धांत को एक बार स्थापित कर देने पर उसके निहित स्वार्थ उसके इर्दगिर्द इकट्ठे होते जातें है। केवल कष्टों से अर्जित सŸा स्वयं को अपदस्थ करने के सभी प्रयासों का पुरजोर विरोध करती है। यही कारण है कि जल्द छुटकारा पा लेने की आशा से सहन किए गए क्षणिक समझौते प्रगति के मार्ग में विकट बाधा बन जाते हैं।
अल्पसंख्यकों की निरंकुशता को उभरने देने या बहुसंख्यकों की इच्छा को अल्पसंख्यकों से भी निचला दर्जा देने के किसी भी विचार को न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता।
-फ्री प्रेस” [1]
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1 ः पुनर्मुद्रितः जनता, दिनांक 28 अप्रैल, 1934