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यह स्थिति बनाए रखना उचित नहीं है। इसका तत्काल उपाय किया जाना चाहिए। इसका एक मात्र प्रभावी उपाय यह दिखाई पड़ता है कि उन चुनिंदा केंद्रों में जिनका प्राथमिक लक्ष्य अनुसूचित जातियों की शिक्षा का है, वहां कालेजों की स्थापना की जाए। अन्य समुदाय इस प्रतिस्पर्धा का विरोध इसलिए नहीं करेंगे कि उनमें से अधिकांश के अपने कालेज हैं। यह सिख, मुस्लिम, भारतीय क्रिश्चियनों और ऐंग्लो इंडियनों जैसी अल्पसंख्यक समुदायों के मामले में भी सही है क्योंकि इनमें से प्रत्येक के अधीन विभिन्न स्कूलों और कालेजों का संचालन किया जाता हैं जहां पर उनके समुदायों के छात्रों पर पहले विचार किया जाता है। लेकिन अछूतों की अपनी ऐसी संस्थाएं नहीं हैं इसलिए उन्हें प्रवेश की इस प्रतिस्पर्धा से अधिक जूझना पड़ता है। मैं बंबई में कालेज प्रारंभ करने का प्रस्ताव करता हूं जिसका अपना एक लक्ष्य होगा जिसे वह पूरा करने की कोशिश करेगा। मेरे अनुमान के अनुसार, ऐसा कालेज स्थापित करने के लिए लगभग छह लाख रुपयों की आवश्यकता होगी। युद्ध-पूर्व समय में यह कम राशि में भी स्थापित किया जा सकता था। लेकिन सामग्री की लागत में बढ़ोŸारी को ध्यान में रखते हुए मैं नहीं समझता कि कालेज को उपर्युक्त राशि से कम में शुरू किया जा सकता है। इतना धन एकत्र करने के लिए अनुसूचित जातियों से अपेक्षा करना असंगत है, क्योंकि वे भारत में सबसे गरीब समुदाय है मैं बिना ब्याज के ऋण के रूप में यह राशि मांगने के लिए बाध्य हूं जिसे उपयुक्त किस्तों में लौटाया जाएगा। प्रस्तावित कालेज की संपिŸायां सरकार के पास प्रतिभूति के रूप में बंधक रखी जाएंगी।
मैं नीचे प्रस्तावित कालेज के बारे में कुछ महत्वपूर्ण विवरण प्रस्तुत कर रहा हूं जिनसे यह संकेत मिलेगा कि कालेज कैसे कार्य करेगाः-
I इसका प्रबंध, चेरिटेबल सोसाइटीज़ अधिनियम के अधीन पंजीकृत सम्यक् रुप
से गठित निकाय द्वारा किया जाएगा।
II इसमें कला और विज्ञान दो भाग होंगे।
III यह यथा उल्लिखित रूप में गैर-सापं्रद्रायिक होगाः
(I) यह सभी जातियों और धर्मों के छात्रों के लिए खुला होगा केवल यह अनुसूचित
जातियों के छात्रों के शैक्षिक हितों को विशेष महत्व देगा।
(II) शिक्षण स्टाफ मिश्रित स्टाफ होगा। नस्ल, धर्म या समुदाय के आधार पर कोई
रोक नहीं होगी।
(III) भारत में विश्वविद्यालयों के विनियमों के अधीन यह सभी प्रांतों के अनुसूचित
जाति के छात्रों के लिए, बिना किसी भेदभाव के, खुला होगा।