74. परिशिष्ट-II हिंदू धर्म और बौद्ध धर्म में नारी की स्थिति - Page 348

329 अनुच्छेद- XXXII

गठन में परिवर्तन केवल परिषद् के सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत या खुले अधिवेशन में प्रतिनिधियों के साधारण बहुमत के अधीन होगा।

  1. 25, 26 और 27 दिसंबर, 1946 को नागपुर में आयोजित दूसरे अधिवेशन की

अखिल भारतीय अनुसूचित जाति छात्र परिसंघ की रिपोर्ट, 2 जून, 1947 को

वी.डी.चाहंडे द्वारा प्रकाशित।

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परिशिष्ट- II

(‘‘अवर न्यू रिपब्लिक’’ शीर्षक के अंतर्गत 21 जनवरी, 1950 को ‘‘ईव्स

वीकली’’ में प्रकाशित लेख का उŸार)

‘‘भारत में नारियां शासनकला में यूरोपीय नारियों से बहुत पहले परिचित थीं। ऐसी नारियों के दृष्टांतों से रामायण और महाभारत भरे पड़े हैं’’। ये पंक्तियां ‘‘अवर न्यू रिपब्लिक’’ शीर्षक के अंतर्गत 21 जनवरी, 1950 को ईव्स वीकली में प्रकाशित लेख में प्रमुख रूप से प्रदर्शित की गई थीं।

क्या लेख का विद्वान लेखक इस तथ्य की ओर संकेत कर रहा है कि महाभारत की मुख्य महिला-पात्र को उसके पति या पतियों (क्योंकि उसके पांच थे) ने जुए में दावफलभ दिया था या सीता, जिसने अपने हरणकर्ता रावण के सभी प्रस्तावों को वीरोचित रूप से ठुकरा दिया था उसे अपनी शुद्धता के बदले में अविश्वास और संदेह प्राप्त हुआ, अग्नि परीक्षा देनी पड़ी और जंगल में निर्वासित कर दिया गया?

यदि उन दिनों में नारी की स्थिति ऐसी थी जैसाकि उपर्युक्त का लेखक हमें विश्वास करने के लिए मजबूर कर रहा है तब हमें आश्चर्य होता है कि द्रौपदी को अपने पांचों पतियों को जुए में हारने का मौका क्यों नहीं दिया गया था सीता को अपने निंदकों और शंकालुओं को चिता पर बैठाने या जंगल में निर्वासित करने का अवसर नहीं दिया गया?

इस संबंध में यह कहना अवश्य ही अधिक उपयुक्त होगा कि उन दिनों में भारत की नारियों का उपयोग शासनकला के लिए किया जाता था।